
देहरादून। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में राज्य सरकार एक नई पहल करने जा रही है। औषधीय गुणों से भरपूर सीबकथोर्न की खेती को प्रदेश में बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की योजना बनाई जा रही है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को स्थायी आय का नया स्रोत मिल सकेगा।
सीबकथोर्न एक बहुउपयोगी और औषधीय फल है, जो समुद्रतल से लगभग तीन से चार हजार मीटर की ऊंचाई पर आसानी से उगाया जा सकता है। पिथौरागढ़ जिले की दारमा और व्यास घाटी में वन विभाग द्वारा इसकी खेती को प्रोत्साहित करने की शुरुआत की जा चुकी है। विशेष रूप से व्यास घाटी के गरव्यांग गांव में इसके अधिक उत्पादन की संभावना जताई जा रही है।
वन विभाग द्वारा यह पहल राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड की वित्तीय सहायता से संचालित की जा रही है। हालांकि वर्तमान में प्रदेश में सीबकथोर्न का उत्पादन सीमित है, जबकि वैश्विक स्तर पर चीन इसका सबसे बड़ा उत्पादक देश है। सरकार का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाकर प्रदेश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।
सीबकथोर्न न केवल औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी इसकी भूमिका अहम है। इसकी मजबूत जड़ें भूमि कटाव को रोकने में सहायक होती हैं, जो उच्च हिमालयी क्षेत्रों की रेतीली भूमि के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
औषधीय गुणों की बात करें तो सीबकथोर्न का उपयोग खांसी, एलर्जी, त्वचा व नेत्र रोगों सहित कई बीमारियों के उपचार में किया जाता है। इसमें विटामिन सी, ए, ई, के, विभिन्न बी-विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट, प्रोटीन, अमीनो एसिड और अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके फल और पत्तियों का उपयोग कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में किया जाता है।
बाजार में इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए सीबकथोर्न से तैयार जूस 500 रुपये प्रति लीटर तक बिक रहा है। इससे किसानों को अच्छी आमदनी मिलने की संभावना है। सरकार का मानना है कि यदि उत्पादन व्यवस्थित रूप से बढ़ाया जाए तो यह फसल उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है।
ग्रामीण उद्यम वेग वृद्धि (रीप) योजना के तहत पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और टिहरी जिलों के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सीबकथोर्न की खेती को प्रोत्साहित करने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। ग्राम्य विकास विभाग के सचिव धीराज गर्ब्याल के अनुसार, स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन देकर इस योजना को धरातल पर उतारा जाएगा।
सरकार की यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होगी, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में सतत कृषि और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती प्रदान करेगी।




