
देहरादून। उत्तराखंड के नगर निकायों की तस्वीर बदलने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश के सभी 108 नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों के व्यापक सुधार के लिए शहरी विकास विभाग ने केंद्र सरकार के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (एनआईयूए) को विस्तृत अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी है। इस अध्ययन के जरिए निकायों की वित्तीय स्थिति, मानव संसाधन, सफाई व्यवस्था और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन समेत विभिन्न व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत सामने लाई जाएगी।
प्रदेश के अधिकांश नगर निकाय लंबे समय से आर्थिक संकट और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। कुछ बड़े नगर निगमों को छोड़ दें तो ज्यादातर निकाय अपने खर्च का बड़ा हिस्सा राज्य और केंद्र सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भर हैं। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार निकायों की स्वयं की आय कुल खर्च के मुकाबले बेहद कम है। यही वजह है कि शहरी विकास से जुड़ी कई योजनाएं अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।
विभागीय अधिकारियों के मुताबिक अध्ययन के दौरान निकायों की आय बढ़ाने के संभावित स्रोतों की पहचान की जाएगी। साथ ही कर संग्रह व्यवस्था, संपत्ति कर, विज्ञापन शुल्क, पार्किंग और अन्य स्थानीय संसाधनों से राजस्व बढ़ाने के उपायों पर भी सुझाव दिए जाएंगे। सरकार का मानना है कि नगर निकायों को आत्मनिर्भर बनाए बिना शहरी विकास की योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू करना संभव नहीं है।
मानव संसाधन की कमी भी निकायों के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है। वर्षों से कई नगर निकायों में नियमित भर्ती नहीं हुई है। सफाई कर्मचारियों, तकनीकी स्टाफ और प्रशासनिक कर्मियों की कमी के कारण कामकाज प्रभावित हो रहा है। कई जगह अस्थायी और कामचलाऊ व्यवस्था के सहारे काम चलाया जा रहा है। अध्ययन में यह भी देखा जाएगा कि निकायों में किस प्रकार के पदों की आवश्यकता है और कर्मचारियों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।
इसके अलावा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सीवरेज, जल निकासी और स्वच्छता व्यवस्था की भी समीक्षा होगी। शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी के कारण कूड़ा निस्तारण और सफाई व्यवस्था निकायों के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है। एनआईयूए इन सभी पहलुओं का अध्ययन कर व्यवहारिक और दीर्घकालिक समाधान सुझाएगा।
वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020-21 में नगर निकायों की स्वयं की आय 136 करोड़ रुपये थी, जबकि सरकार से 1317.85 करोड़ रुपये की सहायता मिली। वर्ष 2024-25 में स्वयं की आय बढ़कर 280 करोड़ रुपये तक पहुंची, लेकिन इसके बावजूद सरकारी सहायता 1075 करोड़ रुपये से अधिक रही। इससे साफ है कि निकाय अभी भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाए हैं।
एनआईयूए देश का प्रमुख शहरी थिंक टैंक माना जाता है, जो वर्ष 1976 से शहरी विकास और प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रहा है। यह संस्थान शहरों की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान और आधुनिक शहरी प्रबंधन मॉडल विकसित करने के लिए जाना जाता है। उत्तराखंड सरकार को उम्मीद है कि एनआईयूए की रिपोर्ट के आधार पर निकायों में व्यापक सुधार लागू किए जा सकेंगे।
शहरी विकास सचिव नितेश कुमार झा ने कहा कि नगर निकायों में वित्तीय प्रबंधन, मानव संसाधन और अन्य व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए यह अध्ययन शुरू कराया गया है। रिपोर्ट आने के बाद उसके आधार पर नई योजनाएं तैयार की जाएंगी और चरणबद्ध तरीके से निकायों में लागू किया जाएगा।




