
चमोली: उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में आज भी सड़क सुविधा का अभाव लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है। चमोली जिले के देवाल ब्लॉक स्थित पिनाऊं गांव में एक बार फिर बदहाल व्यवस्थाओं की तस्वीर सामने आई, जब ग्रामीणों को एक बीमार बुजुर्ग को स्ट्रेचर के सहारे आठ किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक पहुंचाना पड़ा। इसके बाद निजी वाहन से उन्हें अस्पताल भेजा गया।
पिनाऊं गांव निवासी 68 वर्षीय केशर सिंह दानू की अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। गांव तक सड़क सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीणों के सामने उन्हें अस्पताल पहुंचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। इसके बाद गांव के लोगों ने मानवता का परिचय देते हुए केशर सिंह को स्ट्रेचर पर लिटाया और कठिन पहाड़ी रास्तों से आठ किलोमीटर पैदल चलकर घेस सड़क तक पहुंचाया। वहां से उन्हें वाहन के जरिए अस्पताल भेजा गया।
ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। सड़क सुविधा के अभाव में यहां बीमारों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को अक्सर डंडी या स्ट्रेचर के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। बरसात और खराब मौसम के दौरान हालात और भी मुश्किल हो जाते हैं।
विशेष बात यह है कि धुराधारकोट-वांक-पिनाऊं सड़क परियोजना को वर्ष 2015-16 में स्वीकृति मिल चुकी थी। करीब 23 किलोमीटर लंबी इस सड़क की घोषणा अलग-अलग समय में दो मुख्यमंत्रियों—हरीश रावत और त्रिवेंद्र सिंह रावत—द्वारा भी की गई थी। इसके बावजूद एक दशक बीत जाने के बाद भी सड़क का निर्माण पूरा नहीं हो पाया है।
बीडीसी सदस्य प्रदीप दानू ने कहा कि ग्रामीण लंबे समय से सड़क निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक समाधान नहीं निकला। उन्होंने बताया कि गांव के लोग हर आपात स्थिति में खुद ही मरीजों को कंधों और स्ट्रेचर के सहारे सड़क तक पहुंचाने को मजबूर हैं।
वहीं थराली विधायक भूपाल राम टम्टा ने कहा कि सड़क परियोजना की फाइल वन भूमि से संबंधित प्रक्रियाओं में लंबित है। उन्होंने आश्वासन दिया कि लोक निर्माण विभाग को इस मामले में तेजी से कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाएंगे। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के दशकों बाद भी यदि किसी गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई है, तो यह विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।




