
देहरादून: उत्तराखंड में मई महीने तक जारी ठंड और बर्फबारी का असर अब जल विद्युत उत्पादन पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ग्लेशियरों के अपेक्षित स्तर पर नहीं पिघलने से नदियों का जलस्तर कम बना हुआ है, जिसके कारण उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) को बिजली उत्पादन बढ़ाने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
आमतौर पर गर्मियों के दौरान तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, जिससे नदियों में जल प्रवाह बढ़ता है और जल विद्युत परियोजनाओं का उत्पादन भी तेजी पकड़ लेता है। लेकिन इस बार मौसम का मिजाज अलग बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों में मई तक बर्फबारी और ठंडी हवाओं का दौर जारी रहने से ग्लेशियर पर्याप्त मात्रा में नहीं पिघल पा रहे हैं।
स्थिति यह है कि जिन दिनों में यूजेवीएनएल का बिजली उत्पादन सामान्य तौर पर 1.9 करोड़ से 2.2 करोड़ यूनिट प्रतिदिन तक पहुंच जाता था, वहां इस समय उत्पादन 1.2 से 1.3 करोड़ यूनिट के बीच ही सिमटा हुआ है। निगम के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन गई है।
यूजेवीएनएल अपने पीक समय में प्रतिदिन 2.7 से 2.8 करोड़ यूनिट तक बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखता है। सर्दियों के दौरान बर्फ जमने और नदियों के जलस्तर में कमी के कारण उत्पादन घट जाता है, लेकिन मार्च-अप्रैल के बाद आमतौर पर हालात सुधरने लगते हैं। इस वर्ष मौसम में आए असामान्य बदलाव के चलते यह प्रक्रिया प्रभावित हुई है।
हालांकि पिछले महीने कुछ दिनों तक तापमान बढ़ने पर बिजली उत्पादन करीब 1.5 करोड़ यूनिट तक पहुंचा था, लेकिन लगातार बारिश और ठंड लौटने से उत्पादन फिर घट गया। इसका असर राज्य की ऊर्जा व्यवस्था और बिजली आपूर्ति प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।
यूजेवीएनएल के प्रबंध निदेशक एके सिंह ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में अभी भी मौसम काफी ठंडा है, जिसके कारण नदियों का जलस्तर अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ रहा। उन्होंने उम्मीद जताई कि 15 मई के बाद तापमान में बढ़ोतरी होने पर ग्लेशियर पिघलने की प्रक्रिया तेज होगी और बिजली उत्पादन में भी सुधार देखने को मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम के लगातार बदलते पैटर्न का असर जल विद्युत परियोजनाओं पर पड़ रहा है। उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा जल स्रोतों पर निर्भर है, वहां मौसम में असामान्य बदलाव भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।




