
हरिद्वार: उत्तराखंड की पवित्र नगरी हरिद्वार में कुंभ मेले से जुड़ी आरक्षित भूमि पर बढ़ते कब्जों और अवैध निर्माण को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। वर्षों से धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों के केंद्र रहे ये क्षेत्र अब धीरे-धीरे स्थायी निर्माणों और तथाकथित “महलों” में बदलते जा रहे हैं, जिससे धर्मनगरी के मूल स्वरूप पर संकट गहराने लगा है।
भूमा निकेतन के प्रबंधक राजेंद्र के अनुसार, 1980 के दशक में जब कुंभ मेले का स्वरूप अपेक्षाकृत सीमित था, तब संतों और श्रद्धालुओं के लिए साधारण व्यवस्था होती थी। रेत के टीलों और अस्थायी मचानों पर संत साधना और प्रवचन करते थे, जिससे पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक वातावरण बना रहता था।
उन्होंने बताया कि समय के साथ कुंभ क्षेत्र का विस्तार तो हुआ, लेकिन इसके साथ ही भूमि आवंटन की प्रक्रिया में अनियमितताएं भी बढ़ीं। पहले अलग-अलग अखाड़ों और संतों को अस्थायी उपयोग के लिए दी गई भूमि अब स्थायी निर्माणों में बदल चुकी है। आरोप है कि कई स्थानों पर इन जमीनों का अप्रत्यक्ष रूप से लेन-देन भी हुआ, जिस पर न तो सरकारों ने गंभीरता दिखाई और न ही संत समाज ने पर्याप्त ध्यान दिया।
राजेंद्र ने यह भी कहा कि कुंभ मेला के दौरान जिन क्षेत्रों में विशाल धार्मिक आयोजन होते थे, आज वहां बहुमंजिला निर्माण और निजी संपत्तियां खड़ी हो गई हैं। सप्तऋषि क्षेत्र जैसे स्थान, जहां कभी नदी का किनारा खुला और स्वच्छ रहता था, अब बंधों और निर्माणों के बीच सिमटता जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई कब्जे राजनीतिक संरक्षण में हुए हैं, जिसके कारण इन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाई। साथ ही, सिंचाई विभाग और राज्य सरकार की निष्क्रियता को भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।
धर्मनगरी के बदलते स्वरूप को लेकर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि यदि इसी तरह “विकास” के नाम पर अनियंत्रित निर्माण जारी रहा, तो भविष्य में अव्यवस्था और धार्मिक पहचान को नुकसान होने की आशंका है। अंत में उन्होंने प्रशासन, सरकार और संत समाज से अपील की कि वे मिलकर कुंभ क्षेत्र की भूमि का संरक्षण सुनिश्चित करें, ताकि हरिद्वार की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा जा सके।






