
देहरादून। उत्तराखंड में हिमनद झीलों से जुड़े संभावित खतरों की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) को वसुंधरा समेत प्रदेश की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने और उसका परीक्षण करने की अनुमति दे दी है। इस व्यवस्था की शुरुआत वसुंधरा झील से होगी और इसी महीने सीबीआरआई की टीम वहां पहुंचकर आवश्यक उपकरण लगाएगी।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के अनुसार, सीबीआरआई का दल इसी महीने वसुंधरा झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करेगा। इसके बाद वहां स्थापित सिस्टम से मिलने वाली सूचनाओं और उसके काम करने की क्षमता का आकलन किया जाएगा। इस परीक्षण के आधार पर आगे प्रदेश की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर भी इस तकनीक को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
वसुंधरा झील से होगी शुरुआत
राज्य सरकार की अनुमति मिलने के बाद सीबीआरआई ने सिस्टम लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। वसुंधरा झील को शुरुआती परीक्षण के लिए चुना गया है। इसी माह सीबीआरआई की टीम वहां पहुंचकर उपकरण स्थापित करेगी। इसके बाद झील से संबंधित गतिविधियों और सिस्टम से मिलने वाले संकेतों की निगरानी की जाएगी।
सरकार का उद्देश्य हिमनद झीलों में होने वाले संभावित बदलावों की जानकारी समय रहते प्राप्त करना है, ताकि किसी गंभीर स्थिति की आशंका होने पर संबंधित स्तर पर आवश्यक कार्रवाई की जा सके। वसुंधरा झील पर स्थापित सिस्टम से मिलने वाले आंकड़ों और सूचनाओं से इसकी उपयोगिता का भी आकलन होगा।
अगले साल अन्य झीलों पर लगेंगे उपकरण
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने बताया कि वसुंधरा झील पर सिस्टम लगाने के बाद अगले वर्ष अप्रैल और मई में प्रदेश की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर भी ऐसे उपकरण लगाए जाएंगे। इस तरह चरणबद्ध तरीके से सभी संवेदनशील हिमनद झीलों को निगरानी व्यवस्था के दायरे में लाने की योजना है।
राज्य में कुल 13 संवेदनशील हिमनद झीलें चिन्हित की गई हैं। सरकार की योजना इन सभी झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की है। इससे हिमनद झीलों की स्थिति पर लगातार नजर रखने और किसी संभावित खतरे के संकेत मिलने पर समय रहते जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
सीबीआरआई के साथ सी-डैक की तकनीक भी होगी
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, सीबीआरआई के अलावा सी-डैक के माध्यम से भी हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाएगा। दोनों संस्थानों की ओर से लगाए जाने वाले सिस्टम से प्राप्त सूचनाओं और उनकी कार्यप्रणाली की तुलना की जाएगी।
दो अलग-अलग तकनीकी व्यवस्थाओं के माध्यम से प्राप्त जानकारी की तुलना से यह समझने में मदद मिलेगी कि हिमनद झीलों की निगरानी के लिए कौन-सी व्यवस्था अधिक प्रभावी और उपयोगी साबित होती है। इसके आधार पर भविष्य में निगरानी और चेतावनी तंत्र को और मजबूत करने की दिशा में निर्णय लिया जा सकेगा।
पांच जिलों में हैं 13 संवेदनशील हिमनद झीलें
उत्तराखंड में 13 संवेदनशील हिमनद झीलें पांच जिलों में स्थित हैं। इन्हें संवेदनशीलता के आधार पर तीन श्रेणियों में रखा गया है। इनमें पांच झीलें ए श्रेणी, चार बी श्रेणी और चार सी श्रेणी की हैं। इन झीलों की संवेदनशीलता को देखते हुए इनके सर्वे और निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
अभी तक चार हिमनद झीलों के सर्वे का काम पूरा हो चुका है। इसके अलावा इस वर्ष केदारताल और सरस्वती ताल का अध्ययन करने की भी योजना है। सर्वे और अध्ययन के माध्यम से झीलों की स्थिति तथा उनसे जुड़े संभावित जोखिमों को समझने की दिशा में जानकारी जुटाई जा रही है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम से निगरानी व्यवस्था होगी मजबूत
हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किए जाने को उत्तराखंड में आपदा जोखिम की निगरानी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में हिमनद झीलों की स्थिति में होने वाले बदलावों की समय रहते जानकारी मिलना आपदा प्रबंधन की तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
वसुंधरा झील पर इसी महीने लगाए जाने वाले सिस्टम से मिलने वाली जानकारी इस पूरी व्यवस्था का पहला व्यावहारिक परीक्षण होगी। इसके बाद प्राप्त अनुभव और सूचनाओं के आधार पर अगले वर्ष अन्य संवेदनशील झीलों पर सिस्टम लगाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। सीबीआरआई और सी-डैक की व्यवस्थाओं की तुलना से राज्य को भविष्य के लिए अधिक प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।
सरकार की योजना प्रदेश की सभी 13 संवेदनशील हिमनद झीलों को इस निगरानी व्यवस्था से जोड़ने की है। इसके साथ ही झीलों के सर्वे और अध्ययन का काम भी जारी रहेगा, ताकि हिमनद झीलों से जुड़े संभावित खतरों की पहचान, निगरानी और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जा सके।




