
देहरादून: उत्तराखंड के बहादुर बच्चों को अब इस साल से राज्य स्तर पर बाल वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इसकी घोषणा की है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद प्रदेश में उन बच्चों को सम्मानित करने का रास्ता साफ हो गया है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया है।
राज्य में बहादुर बच्चों को हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर सम्मानित किए जाने की परंपरा रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह प्रक्रिया किसी वजह से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। भारतीय बाल कल्याण परिषद की ओर से भी ऐसे बच्चों से आवेदन नहीं लिए जा रहे थे। इसके चलते प्रदेश में बहादुरी का परिचय देने वाले कई बच्चे राज्य स्तर पर मिलने वाले सम्मान से वंचित रह गए।
मुख्यमंत्री की घोषणा को ऐसे बच्चों के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रदेश में अक्सर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जब बच्चों ने अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों को बचाने के लिए साहस दिखाया। कई बच्चों ने गुलदार जैसे जंगली जानवरों से मुकाबला कर अपने परिजनों और अन्य लोगों की जान बचाई है, जबकि कुछ बच्चों ने नदी, नाले और तेज पानी में बह रहे लोगों को बचाने का जोखिम उठाया है।
राज्य के 15 बाल वीरों को मिल चुका राष्ट्रीय पुरस्कार
उत्तराखंड के बाल वीरों ने राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया है। राज्य के अब तक 15 बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिल चुका है। इनमें टिहरी गढ़वाल के हरीश राणा को वर्ष 2003 में, हरिद्वार की माजदा को 2004 में और अल्मोड़ा की पूजा कांडपाल को 2007 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिला।
इसके बाद देहरादून के प्रियांशु जोशी और दिवंगत श्रुति लोधी को वर्ष 2010 में, रुद्रप्रयाग के दिवंगत कपिल नेगी को 2011 में, चमोली की दिवंगत मोनिका उर्फ मनीषा को 2014 में और देहरादून के लाभांशु को 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया।
टिहरी के अर्जुन को वर्ष 2015, देहरादून के सुमित ममगाई को 2016, टिहरी गढ़वाल के पंकज सेमवाल को 2017, पौड़ी गढ़वाल की राखी को 2019, नैनीताल के सनी और पिथौरागढ़ के मोहित चंद उप्रेती को 2020 तथा रुद्रप्रयाग के नितिन रावत को वर्ष 2022 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिल चुका है।
गुलदार से भिड़कर भाई की जान बचाई थी राखी ने
पौड़ी गढ़वाल की बहादुर बेटी राखी की कहानी भी प्रदेश के बाल वीरों के साहस का उदाहरण है। राखी ने अपने चार साल के छोटे भाई को गुलदार के हमले से बचाने के लिए उसका सामना किया था। अपनी जान की परवाह किए बिना गुलदार से भिड़कर उसने भाई की जान बचाई। उसकी इस बहादुरी के लिए उसे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जंगली जानवरों के हमले, नदी-नालों में अचानक बढ़ता जलस्तर और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियां बच्चों के सामने भी कई बार चुनौती खड़ी करती हैं। ऐसे में बहादुरी दिखाने वाले बच्चों को राज्य स्तर पर सम्मान दिए जाने से उनके साहस को पहचान मिलेगी और अन्य बच्चों को भी विपरीत परिस्थितियों में मानवता और साहस का परिचय देने की प्रेरणा मिलेगी।
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद अब इस पुरस्कार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी की जाएगी। इससे प्रदेश के उन बच्चों को राज्य स्तर पर पहचान मिलने की उम्मीद है, जिन्होंने असाधारण साहस दिखाकर दूसरों की जान बचाई है।




