
उत्तराखंड के निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में संचालित मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं, इसकी निगरानी के लिए सरकार ने प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति का गठन किया है। नियमानुसार इस समिति को प्रत्येक तीन वर्ष में फीस की समीक्षा कर संशोधित दरें तय करनी होती हैं, लेकिन लंबे समय से यह प्रक्रिया अधूरी पड़ी है।
स्थिति यह है कि समिति के अब तक 12 अध्यक्ष बदल चुके हैं, परंतु शुल्क संशोधन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। विभागीय अधिकारियों के अनुसार समिति का कोरम कभी पूरा नहीं हुआ, जिसके कारण मानकों के अनुरूप नई फीस निर्धारित नहीं हो पाई।
समिति की संरचना में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की ओर से नामित सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया जाता है। इसके अलावा सचिव चिकित्सा शिक्षा, सचिव तकनीकी शिक्षा, सचिव न्याय सदस्य होते हैं। राज्य सरकार द्वारा नामित वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी, राज्यपाल की ओर से नामित राज्य विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद भी सदस्य के रूप में शामिल किए जाते हैं। समिति के अध्यक्ष द्वारा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट भी नामित किया जाता है।
इस बीच निजी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की ओर से मनमाने शुल्क वसूले जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। विद्यार्थियों का आरोप है कि उनसे ऊंची फीस ली जाती है, लेकिन उसके अनुरूप बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं। वहीं निजी शिक्षण संस्थान दावा करते हैं कि उनकी फीस निर्धारित मानकों के अनुरूप और उचित है।
फीस निर्धारण को लेकर कई बार विवाद की स्थिति बन चुकी है। शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण के बीच फीस में पारदर्शिता और समानता की मांग लगातार उठ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर शुल्क संशोधन और निगरानी की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई तो छात्रों और अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जाएगा।
सरकार और संबंधित विभागों के लिए यह जरूरी हो गया है कि समिति का कोरम शीघ्र पूरा कर नियमानुसार फीस का पुनर्निर्धारण सुनिश्चित किया जाए, ताकि छात्रों को राहत मिल सके और निजी संस्थानों में पारदर्शिता बनी रहे।





