
देहरादून। उत्तराखंड में शिक्षक नियुक्तियों और पात्रता परीक्षाओं में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य में शादी के बाद अन्य राज्यों से आकर बसने वाली महिलाओं को जहां शिक्षक भर्ती में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा रहा है, वहीं शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में उन्हें आरक्षित वर्ग का लाभ मिल रहा है। इस दोहरी नीति ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि शादी के बाद उत्तराखंड में बसी अन्य राज्यों की अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं को राज्य स्तरीय आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसके बावजूद शिक्षा विभाग द्वारा टीईटी परीक्षा में इन महिलाओं को आरक्षित श्रेणी में शामिल किया जा रहा है, जिससे वे अपेक्षाकृत कम अंकों पर परीक्षा उत्तीर्ण कर लेती हैं।
🔸 टीईटी में आरक्षण, भर्ती में नहीं
टीईटी परीक्षा में आरक्षित वर्ग की महिलाओं को न्यूनतम 60 अंक लाने होते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को 90 अंक प्राप्त करने अनिवार्य हैं। ओबीसी वर्ग के लिए यह सीमा 75 अंक है। इस व्यवस्था के तहत अन्य राज्यों से आई महिलाएं आरक्षित वर्ग के रूप में टीईटी पास कर रही हैं और फिर शिक्षक भर्ती में शामिल हो रही हैं।
हालांकि भर्ती प्रक्रिया के दौरान इन महिलाओं को आरक्षित वर्ग में चयनित न कर सामान्य वर्ग की मेरिट सूची में रखा जा रहा है। इससे न केवल सामान्य वर्ग के स्थानीय अभ्यर्थियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, बल्कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
🔸 पूर्व भर्तियों में भी सामने आया मामला
पूर्व में हुई 2900 पदों की शिक्षक भर्ती में इस तरह की कई महिलाओं का चयन किया गया था। हालांकि हाईकोर्ट के निर्णय के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिए गए। वर्तमान में चल रही 1670 पदों की भर्ती में भी इस श्रेणी की महिलाओं ने आवेदन किया है, जिससे विवाद और गहरा गया है।
🔸 प्रमाण पत्र सत्यापन पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या की जड़ जाति प्रमाण पत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया में है। टीईटी के लिए आवेदन ऑनलाइन किए जाते हैं और वास्तविक स्थिति काउंसलिंग के दौरान सामने आती है। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रमाण पत्रों की गहन जांच की जाए, तो इस तरह की विसंगतियों से बचा जा सकता है।
एससीईआरटी की निदेशक बंदना गर्ब्याल का कहना है कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अभ्यर्थी राज्य के आरक्षण नियमों के अनुरूप पात्र है या नहीं। इससे भविष्य में कानूनी और प्रशासनिक उलझनों से बचा जा सकेगा।
🔸 नीति स्पष्ट करने की मांग
शिक्षा विभाग की इस विरोधाभासी व्यवस्था को लेकर अभ्यर्थियों और विशेषज्ञों द्वारा नीति को स्पष्ट और एकरूप करने की मांग उठने लगी है। ताकि न तो स्थानीय उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित हों और न ही बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप की स्थिति बने।




