
नैनीताल। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों को परिवार, मित्रों और सामाजिक जीवन से दूर कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप अकेलापन, तनाव, भावनात्मक असंतुलन और अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई मामलों में यही स्थिति बच्चों को आत्मघाती प्रयास जैसे गंभीर कदम उठाने तक पहुंचा रही है।
नैनीताल स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल (एसटीएच) के बाल रोग विभाग के आंकड़े भी इस चिंता को बल देते हैं। अस्पताल में प्रत्येक महीने औसतन तीन से चार ऐसे बच्चों को भर्ती किया जा रहा है जिन्होंने किसी न किसी कारण आत्मघाती प्रयास किया। पिछले छह महीनों में ऐसे 15 से अधिक मामले सामने आए हैं। इनमें अधिकांश बच्चों की आयु 10 से 16 वर्ष के बीच है। अस्पताल के अनुसार बच्चों द्वारा दवाओं या जहरीले पदार्थ का सेवन करना, फांसी लगाने का प्रयास अथवा स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं दर्ज की गई हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पूजा अग्रवाल का कहना है कि लंबे समय तक मोबाइल पर रील्स देखना, ऑनलाइन गेम खेलना और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना बच्चों के सामाजिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर रहा है। पढ़ाई का बढ़ता दबाव, परिवार के साथ संवाद में कमी और डिजिटल दुनिया पर अत्यधिक निर्भरता मिलकर बच्चों के व्यवहार में नकारात्मक बदलाव ला रहे हैं।
अस्पताल में पहुंचे कई मामलों में मोबाइल की लत एक प्रमुख कारण के रूप में सामने आई। एक मामले में 11वीं कक्षा का छात्र प्रतिदिन आठ से दस घंटे मोबाइल इस्तेमाल करता था। परिजनों की डांट से नाराज होकर वह घर छोड़कर चला गया और दो दिन बाद लौटने पर उसे चिकित्सकीय जांच के लिए अस्पताल लाया गया।
दूसरे मामले में 13 वर्षीय किशोरी लगातार मोबाइल पर रील्स देखती थी। परिजनों द्वारा मोबाइल हटाने पर उसने गुस्से और भावनात्मक आघात में जहरीला पदार्थ खा लिया। समय रहते अस्पताल पहुंचाने से उसकी जान बच गई और उपचार के बाद उसकी स्थिति सामान्य बताई गई।
इसी तरह दसवीं कक्षा के एक छात्र ने तब कीटनाशक पी लिया जब उसका एंड्रॉयड फोन खराब हो गया और परिजनों ने उसे तुरंत ठीक कराने से इनकार कर दिया। काउंसिलिंग के दौरान चिकित्सकों को पता चला कि छात्र मोबाइल पर अत्यधिक निर्भर हो चुका था।
मनोवैज्ञानिक डॉ. युवराज पंत के अनुसार बच्चे आज अकेलेपन, सामाजिक तुलना, पढ़ाई के दबाव और असफलता के डर से मानसिक रूप से अधिक प्रभावित हो रहे हैं। यदि परिवार में संवाद की कमी हो और बच्चे को अपनी बात कहने का अवसर न मिले, तो वह तनाव को भीतर दबाए रखता है, जो आगे चलकर गंभीर मानसिक संकट का रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि वे प्रतिदिन कुछ समय बिना मोबाइल के बच्चों के साथ बिताएं, उनकी बात ध्यान से सुनें और स्क्रीन टाइम पर संतुलित नियंत्रण रखें। बच्चों को खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियों और अन्य रुचियों से जोड़ना भी आवश्यक है। साथ ही मोबाइल को न तो पुरस्कार बनाया जाए और न ही दंड का माध्यम। यदि बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव, चुप्पी, नींद या भोजन में कमी, गुस्सा या उदासी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना देर किए योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक का संतुलित उपयोग, परिवार के साथ नियमित संवाद और समय पर मनोवैज्ञानिक सहायता बच्चों को मानसिक तनाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।





