
- 71 गोवंश गायब, सचिव निलंबित
- चारे में घोटाला: एसडीएम निरीक्षण में खुली पोल
- गढ़ी बिहारीपुर गोशाला की बदहाली सामने
- 230 गोवंश का हिसाब, पर 71 का पता नहीं
- ग्राम पंचायत सचिव की लापरवाही उजागर
कानपुर | कानपुर के बिल्हौर ब्लॉक क्षेत्र की गढ़ी बिहारीपुर गोशाला में शुक्रवार को एसडीएम बिल्हौर डॉ. संजीव दीक्षित और मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. आईडीएन चतुर्वेदी द्वारा किए गए निरीक्षण में भारी अनियमितताएं सामने आईं। गोशाला के रजिस्टर में 230 गोवंश दर्ज थे, लेकिन मौके पर 71 गोवंश गायब पाए गए। इसके बावजूद रजिस्टर में चारे की खपत 230 पशुओं के आधार पर दिखाई गई थी, जो सीधा-सीधा गड़बड़ी और चारा घोटाले की ओर इशारा करती है।
निरीक्षण के दौरान गोशाला में तैनात आठ गोपालकों में से केवल तीन ही अपनी ड्यूटी पर मौजूद मिले, जबकि बाकी ड्यूटी से गायब थे। गायब गोवंशों के बारे में कोई संतोषजनक जवाब भी नहीं दिया जा सका। स्थिति गंभीर देख अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई की सिफारिश की और प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर ग्राम पंचायत सचिव समीर कुमार को निलंबित कर दिया गया। साथ ही ककवन ब्लॉक के बीडीओ से भी जवाब तलब किया गया है।
गोशाला की हालत बेहद खराब पाई गई। भूसा और खली का गोदाम खाली था, जबकि कई जगहों पर टूटी हुई चारदीवारी से जानवर बाहर निकलकर आसपास की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे थे। चोकर भंडारण स्थल और अन्य स्थानों पर गंदगी मिली, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। ग्रामीणों ने अधिकारियों को बताया कि ग्राम पंचायत अधिकारी महीने में सिर्फ एक या दो बार ही गोशाला में आते थे, जिसके कारण व्यवस्थाएं लगातार बिगड़ती चली गईं।
निरीक्षण के दौरान दो गोवंश मृत अवस्था में भी मिले, जिनका निस्तारण अधिकारियों द्वारा मौके पर ही करा दिया गया। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि टूटी हुई दीवारों के कारण जानवर अक्सर खेतों में पहुंच जाते हैं और खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन इस संबंध में गोशाला प्रबंधन ने कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
एसडीएम ने स्पष्ट किया कि निरीक्षण के आधार पर कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं और चारे की खपत तथा गोवंशों की संख्या में बड़ा अंतर सीधे भ्रष्टाचार और लापरवाही को दर्शाता है। डीएम को भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर आगे और भी कार्रवाई की संभावना है। यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर ग्राम पंचायत स्तर पर चल रहे पशुशाला प्रबंधन की खामियों और अधिकारियों की उदासीनता को उजागर करता है, जिससे गोवंश संरक्षण की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।







