
चमोली। विश्व प्रसिद्ध श्री बदरीनाथ धाम में वर्षों तक ऐसी अनूठी धार्मिक परंपरा निभाई जाती रही, जिसने मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता और श्रद्धालुओं की आस्था को एक नई पहचान दी। मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दान पात्रों, थाली भेंट और अन्य माध्यमों से अर्पित नकद राशि, सोना, चांदी तथा बहुमूल्य वस्तुओं का पूरा लेखा-जोखा प्रतिदिन भगवान बदरीनाथ के समक्ष पढ़कर सुनाया जाता था। हालांकि वर्ष 2021 के बाद यह परंपरा बंद हो गई और अब इसे लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।
मंदिर प्रशासन के अनुसार, जब भी दान पात्रों और अन्य चढ़ावे की गणना पूरी होती थी, उसके बाद बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के मुख्य कार्याधिकारी शयन आरती के उपरांत मंदिर के मंडप में पहुंचते थे। गर्भगृह की ओर मुख करके वे भगवान बदरीविशाल के समक्ष उस दिन प्राप्त नकद दान, सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का विस्तृत विवरण पढ़ते थे। इस दौरान धर्माधिकारी, वेदपाठी और अनेक श्रद्धालु भी उपस्थित रहते थे।
यह व्यवस्था वर्ष 2012 में तत्कालीन बीकेटीसी मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह के कार्यकाल में शुरू की गई थी। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार खजांची दान की पूरी गणना कर उसका अभिलेख तैयार करता और उसे मुख्य कार्याधिकारी को सौंपता था। इसके बाद रात्रि में शयन आरती के पश्चात मुख्य कार्याधिकारी भगवान के समक्ष प्रार्थना करते हुए कहते थे कि श्रद्धालुओं से प्राप्त समस्त चढ़ावा भगवान का है और इसका उपयोग भी मंदिर व्यवस्था, धार्मिक गतिविधियों तथा भगवान की सेवा के लिए ही किया जाएगा।
इस परंपरा को मंदिर प्रशासन की पारदर्शी कार्यप्रणाली और धार्मिक उत्तरदायित्व का प्रतीक माना जाता था। विशेष बात यह रही कि कोरोना महामारी के दौरान भी यह व्यवस्था जारी रही। लेकिन वर्ष 2021 में तत्कालीन मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह के सेवानिवृत्त होने के बाद यह परंपरा समाप्त हो गई। इसके बाद दान की नियमित गणना तो होती रही, लेकिन भगवान बदरीनाथ के समक्ष सार्वजनिक रूप से चढ़ावे का विवरण पढ़कर सुनाने की व्यवस्था बंद कर दी गई।
पूर्व मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह ने बताया कि वर्ष 2012 में चढ़ावे की गणना प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए थे। इसी क्रम में गणना करने वाले कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाले विशेष वस्त्र (ढांगरी) पहनना अनिवार्य किया गया था, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता या संदेह की गुंजाइश न रहे। हालांकि इस निर्णय का कुछ कर्मचारियों ने विरोध भी किया था। उनका कहना था कि ऐसी व्यवस्था केवल गणना कक्ष तक सीमित रहनी चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि दान गणना प्रक्रिया में स्थानीय सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से माणा, बामणी और पांडुकेश्वर गांवों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ पंडा पंचायत के चार-चार प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की व्यवस्था बनाई गई थी। हालांकि समय के साथ यह व्यवस्था भी नियमित रूप से लागू नहीं रह सकी।
हाल के दिनों में बदरीनाथ मंदिर के चढ़ावे से जुड़े मामलों के सामने आने के बाद इस ऐतिहासिक परंपरा की फिर से चर्चा होने लगी है। कई लोगों का मानना है कि भगवान के समक्ष प्रतिदिन चढ़ावे का सार्वजनिक लेखा प्रस्तुत करने जैसी व्यवस्था न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करती थी, बल्कि मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता और श्रद्धालुओं के विश्वास को भी सुदृढ़ करती थी।




