
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्वास्थ्य से जुड़ी एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। लोग मामूली लक्षण दिखाई देने पर सीधे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) प्लेटफॉर्म से सलाह लेकर दवाओं का सेवन कर रहे हैं, जिसका गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहा है। दून अस्पताल के मेडिसिन विभाग की ओपीडी में प्रतिदिन औसतन 15 ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं, जिन्हें गलत दवा सेवन के कारण शरीर में रिएक्शन हो रहा है।
चिकित्सकों के अनुसार मरीज घबराहट, त्वचा पर खुजली, चेहरे पर सूजन, एलर्जी और शरीर में असामान्य प्रतिक्रियाओं जैसी समस्याओं के साथ अस्पताल आ रहे हैं। कई मामलों में दवाओं के दुष्प्रभाव शरीर के अन्य अंगों पर भी असर डाल सकते हैं, जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अरुण पांडेय ने बताया कि दवाओं का चयन मरीज की शारीरिक स्थिति, पूर्व बीमारियों, बीपी, शुगर स्तर और अन्य मेडिकल पैरामीटर्स को ध्यान में रखकर किया जाता है। एआई केवल उपलब्ध डाटा और लक्षणों के आधार पर संभावित बीमारियों की सूची देता है, लेकिन वह मरीज की शारीरिक जांच नहीं करता। ऐसे में गलत दवा का सुझाव मिलने की आशंका बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई दवाओं के नाम और स्पेलिंग मिलती-जुलती होती हैं। एआई द्वारा सुझाई गई दवा वास्तविक बीमारी से मेल न खाए तो गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। पिछले एक से डेढ़ वर्ष में ऐसे मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
इतना ही नहीं, कई लोग अपनी जांच रिपोर्ट भी एआई के माध्यम से समझने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट में दर्शाए गए आंकड़ों के आधार पर एआई संभावित बीमारियों की विस्तृत सूची बता देता है, जिससे मरीजों में अनावश्यक डर पैदा हो जाता है। कई बार यह डर उन्हें अधूरा इलाज करने या सर्जरी से पीछे हटने जैसे फैसले लेने पर मजबूर कर देता है।
डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि एआई एक सहायक तकनीक हो सकती है, लेकिन इसे चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं माना जा सकता। किसी भी बीमारी के लक्षण दिखने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना और उनके निर्देशानुसार दवा लेना ही सुरक्षित उपाय है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि इंटरनेट या एआई आधारित सुझावों पर भरोसा कर स्वयं दवा लेने की प्रवृत्ति से बचें। समय रहते सही चिकित्सा परामर्श लेना ही गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से बचाव का एकमात्र सुरक्षित तरीका है।




