
देहरादून। मध्य हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के गहराते प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। Hemvati Nandan Bahuguna Garhwal University के पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा किए गए दीर्घकालिक शोध में यह सामने आया है कि बढ़ते तापमान, घटते हिमपात और बदलते वर्षा पैटर्न ने क्षेत्र की पारिस्थितिक स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल International Journal of Biodiversity Science, Ecosystem Services & Management में प्रकाशित हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहले जहां पर्याप्त हिमपात होता था, अब वहां बर्फबारी में उल्लेखनीय कमी देखी जा रही है। हिमपात देर से हो रहा है और जल्दी पिघल भी जा रहा है, जिससे जलधाराओं और पारंपरिक नौलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कई जलस्रोत, जो कभी सालभर जल उपलब्ध कराते थे, अब मौसमी होते जा रहे हैं।
बारिश के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव देखा गया है। कुल वर्षा में बहुत अधिक कमी भले न आई हो, लेकिन अब कम समय में अत्यधिक वर्षा और लंबे सूखे दौर सामान्य हो गए हैं। इससे भूस्खलन, मृदा अपरदन और कृषि फसलों को भारी नुकसान हो रहा है।
वन क्षेत्रों के लगातार दोहन और प्राकृतिक भोजन की कमी के कारण वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन विस्तार ने उनके आवास को प्रभावित किया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
जलवायु परिवर्तन का असर औषधीय वनस्पतियों पर भी स्पष्ट दिख रहा है। कुटकी, अतीस, जटामासी, सालम पंजा और चिरायता जैसे बहुमूल्य औषधीय पौधों की संख्या और पुनर्जनन क्षमता में गिरावट दर्ज की गई है। अत्यधिक दोहन और बदलती जलवायु ने इस संकट को और गहरा किया है।
पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिक प्रो. आर.के. मैखुरी का कहना है कि इस समस्या को केवल जलवायु परिवर्तन या केवल विकास परियोजनाओं के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। वर्ष 1988-89 से चल रहे शोध के आधार पर उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक समाधान के लिए वैज्ञानिक रणनीति, सामुदायिक भागीदारी, जल स्रोत संरक्षण और औषधीय पौधों के वैज्ञानिक प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मध्य हिमालय की पारिस्थितिक स्थिरता और उससे जुड़ी करोड़ों लोगों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।




