
देहरादून। उत्तराखंड में सार्वजनिक संस्थाओं और उपक्रमों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में नई व्यवस्था लागू की जा रही है। इसके तहत प्रदेश के करीब चार हजार सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थाओं को अपनी महत्वपूर्ण जानकारियां जनता के सामने सार्वजनिक करनी होंगी। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत संबंधित संस्थाओं को 17 बिंदुओं पर अपना मैनुअल तैयार कर उसे लोगों के लिए उपलब्ध कराना अनिवार्य किया गया है।
इन जानकारियों को संस्थाओं की वेबसाइट के साथ-साथ बोर्ड नोटिस के माध्यम से भी सार्वजनिक करना होगा। व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि लोगों को किसी संस्था से संबंधित बुनियादी और महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने के लिए बार-बार अलग-अलग स्तर पर आवेदन या पत्राचार न करना पड़े। संस्था किस उद्देश्य से बनाई गई है, उसमें कितने कर्मचारी कार्यरत हैं और उन्हें कितना मासिक वेतन दिया जा रहा है, जैसी जानकारियां लोगों को एक ही स्थान पर उपलब्ध हो सकेंगी।
17 बिंदुओं पर देना होगा ब्योरा
सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थाओं को आरटीआई अधिनियम के तहत तैयार किए जाने वाले मैनुअल में 17 निर्धारित बिंदुओं पर जानकारी देनी होगी। इसमें संस्था के गठन का उद्देश्य और उसके कार्यक्षेत्र से संबंधित जानकारी के साथ कर्मचारियों से जुड़ा विवरण भी शामिल होगा।
संस्थाओं को स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों की संख्या तथा उन्हें मिलने वाले मासिक वेतन की जानकारी भी सार्वजनिक करनी होगी। इसके अलावा संस्था किस सेवा या उद्देश्य के लिए स्थापित की गई है, इसका विवरण भी लोगों के सामने रखना होगा।
इस तरह तैयार मैनुअल को केवल कार्यालयी रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि वेबसाइट और बोर्ड नोटिस के माध्यम से सार्वजनिक किया जाएगा। इससे आम लोगों को संबंधित संस्था के कामकाज और उसकी प्रशासनिक संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त करने में आसानी होगी।
हर साल अपडेट करनी होगी जानकारी
नई व्यवस्था के तहत सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थाओं को 17 बिंदुओं पर उपलब्ध कराई गई जानकारी को हर साल अपडेट करना होगा। इसका मतलब यह है कि एक बार मैनुअल तैयार कर देने के बाद संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होंगी। कर्मचारियों की संख्या, वेतन और अन्य संबंधित सूचनाओं में बदलाव होने पर उन्हें समय-समय पर अद्यतन किया जाएगा।
जानकारी को नियमित रूप से अपडेट करने की व्यवस्था से लोगों को संस्थाओं की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी मिल सकेगी। इससे सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ अधिकारियों और संबंधित विभागों की जवाबदेही भी तय करने में मदद मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और केंद्र के दिशा-निर्देशों का संदर्भ
सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थाओं के लिए इस तरह की सूचनाएं सार्वजनिक करने की व्यवस्था सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों से जुड़ी है। समाचार के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में इसे लागू कराने की जिम्मेदारी सूचना आयोग की बताई गई है।
कार्मिक मंत्रालय की ओर से भी इससे संबंधित दिशा-निर्देश पूर्व में जारी किए जा चुके हैं। अब उत्तराखंड में इस व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए संस्थाओं को अपना मैनुअल तैयार कर जनता के सामने रखने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
ऑडिट के जरिए होगी व्यवस्था की जांच
मैनुअल की व्यवस्था वास्तव में लागू हुई है या नहीं, इसकी जांच के लिए राज्य की दो निजी संस्थाओं को ऑडिट की जिम्मेदारी दी गई है। ये संस्थाएं प्रदेश के सार्वजनिक उपक्रमों और संबंधित संस्थाओं का निरीक्षण करेंगी।
ऑडिट के दौरान यह देखा जाएगा कि संबंधित संस्था ने निर्धारित 17 बिंदुओं के अनुसार मैनुअल तैयार किया है या नहीं और उसे जनता के लिए उपलब्ध कराया गया है या नहीं। इसके साथ ही मैनुअल की हार्ड कॉपी या सॉफ्ट कॉपी समेत ऑडिट रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी।
दोनों निजी संस्थाओं को अपनी ऑडिट रिपोर्ट 15 फरवरी 2027 तक उत्तराखंड सूचना आयोग के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। इस रिपोर्ट के आधार पर यह आकलन किया जाएगा कि सार्वजनिक संस्थाओं ने पारदर्शिता से संबंधित निर्धारित व्यवस्था का पालन किया है या नहीं।
लापरवाही पर अधिकारियों पर हो सकती है कार्रवाई
नई व्यवस्था के तहत यदि कोई संस्था निर्धारित मानकों के अनुसार मैनुअल तैयार नहीं करती या आवश्यक जानकारी सार्वजनिक नहीं करती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। ऑडिट में खरा न उतरने वाली संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संभावना जताई गई है।
सूचना आयोग ऐसे मामलों में संबंधित उच्च संस्थाओं को भी रिपोर्ट भेज सकता है। इससे उन अधिकारियों पर दबाव बढ़ेगा जिनके जिम्मे संस्थाओं में आरटीआई से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक और अपडेट रखने की जिम्मेदारी होगी।
जनता को एक जगह मिलेगी जरूरी जानकारी
मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी के अनुसार, कई बार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझते और जनता के कार्यों में टालमटोल करते हैं। उनका कहना है कि मैनुअल सार्वजनिक होने से विभाग की कार्यक्षमता और जिम्मेदारियों को लेकर पारदर्शिता आएगी और लोगों के कामकाज में तेजी आएगी।
मैनुअल के सार्वजनिक होने से लोगों को यह समझने में आसानी होगी कि संबंधित संस्था किस उद्देश्य से स्थापित की गई है, उसकी जिम्मेदारियां क्या हैं और वहां कितने कर्मचारी कार्यरत हैं। कर्मचारियों की संख्या और मासिक वेतन जैसी जानकारी भी सार्वजनिक होने से संस्थाओं के प्रशासनिक ढांचे की जानकारी आम लोगों को मिल सकेगी।
करीब चार हजार संस्थाएं होंगी दायरे में
उत्तराखंड में करीब चार हजार सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थाओं को इस व्यवस्था के दायरे में लाने की बात कही गई है। इन संस्थाओं को अपने स्तर पर मैनुअल तैयार कर उसे सार्वजनिक करना होगा। इसके लिए वेबसाइट के साथ बोर्ड नोटिस का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
इतनी बड़ी संख्या में संस्थाओं को एक समान सूचना व्यवस्था से जोड़ने का उद्देश्य प्रदेश में सूचना के अधिकार को अधिक प्रभावी बनाना है। यदि संस्थाएं निर्धारित समय पर जानकारी उपलब्ध कराती हैं और उसे हर वर्ष अपडेट करती हैं तो आम नागरिकों को सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज से संबंधित जरूरी सूचनाएं आसानी से मिल सकेंगी।
पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर जोर
नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। अभी कई मामलों में लोगों को किसी संस्था से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए अलग-अलग कार्यालयों में संपर्क करना पड़ता है या आरटीआई के माध्यम से सूचना मांगनी पड़ती है। मैनुअल के माध्यम से पहले से निर्धारित सूचनाएं सार्वजनिक होने पर ऐसी जानकारियों तक पहुंच आसान हो सकती है।
इसके साथ ही हर साल सूचना अपडेट करने और स्वतंत्र ऑडिट कराने की व्यवस्था से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि सार्वजनिक की गई जानकारी पुरानी न हो। 15 फरवरी 2027 तक ऑडिट रिपोर्ट मिलने के बाद सूचना आयोग के स्तर से यह देखा जाएगा कि संबंधित संस्थाओं ने निर्धारित व्यवस्था का कितना पालन किया है।
इस पूरी व्यवस्था के लागू होने के बाद प्रदेश की हजारों सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां आम लोगों के लिए अधिक आसानी से उपलब्ध होने की उम्मीद है। इससे संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने, अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट करने और जनता के कार्यों में अनावश्यक देरी को कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है।




