
इंदौर | मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर की गई साइबर ठगी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घटना ने न केवल पुलिस प्रशासन बल्कि आम नागरिकों को भी सतर्क कर दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डीपफेक तकनीक अब अपराधियों के लिए नया हथियार बनती जा रही है, जिसके जरिए वे लोगों को भावनात्मक और मानसिक रूप से डराकर आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
कैसे रची गई साजिश?
जानकारी के अनुसार, 10वीं कक्षा का एक छात्र पारिवारिक नाराजगी के बाद घर से बिना बताए धार्मिक स्थल चला गया। परिजनों ने जब उसे घर नहीं लौटते देखा तो चिंतित होकर उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई और सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीर और संपर्क विवरण साझा किए।
यहीं से साइबर ठगों को मौका मिल गया। बदमाशों ने सोशल मीडिया पर उपलब्ध फोटो का उपयोग करते हुए डीपफेक तकनीक के माध्यम से एक फर्जी वीडियो तैयार किया। वीडियो में छात्र को बंधक जैसी स्थिति में दिखाया गया और परिजनों को वीडियो कॉल कर दावा किया गया कि बच्चा उनके कब्जे में है।
डर का फायदा उठाकर वसूली
वीडियो कॉल के दौरान आरोपियों ने बच्चे की जान को खतरे में बताकर फिरौती की मांग की। घबराए परिवार ने बिना देर किए बताए गए क्यूआर कोड पर कुल 1 लाख 2 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए। हालांकि अगले दिन छात्र ने स्वयं अपने मित्र को फोन कर बताया कि वह सुरक्षित है और धार्मिक स्थल पर मौजूद है। इसके बाद परिवार को समझ आया कि वे डिजिटल ठगी का शिकार हो चुके हैं।
शिकायत से बचते हैं कई पीड़ित
क्राइम ब्रांच अधिकारियों के अनुसार, यह पहला मामला नहीं है। डीपफेक वीडियो बनाकर ब्लैकमेलिंग, आपत्तिजनक कंटेंट तैयार कर धमकी देने और ऑनलाइन ठगी के कई मामले सामने आ चुके हैं। विशेष रूप से महिलाएं, बुजुर्ग और प्रभावशाली लोग ऐसे अपराधियों के निशाने पर रहते हैं। बदनामी के डर से कई लोग लाखों रुपये गंवाने के बाद भी पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराते। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाती है, फिर भी सामाजिक दबाव के कारण लोग सामने आने से हिचकिचाते हैं।
जांच की दिशा
क्राइम ब्रांच ने मामले में तकनीकी जांच शुरू कर दी है।
- संदिग्ध मोबाइल नंबरों की लोकेशन ट्रैक की जा रही है
- कॉल रिकॉर्ड्स और आईपी डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है
- उपयोग किए गए क्यूआर कोड और बैंक खातों की जांच की जा रही है
- डिजिटल ट्रांजैक्शन की पूरी ट्रेल खंगाली जा रही है
अधिकारियों का मानना है कि बैंक खातों और डिजिटल पेमेंट लिंक के जरिए गिरोह के मास्टरमाइंड तक पहुंचा जा सकता है।
बढ़ता डिजिटल खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग तेजी से बढ़ रहा है। एआई आधारित सॉफ्टवेयर की मदद से किसी भी व्यक्ति की फोटो या वीडियो को एडिट कर यथार्थ जैसा फर्जी वीडियो तैयार किया जा सकता है। आम नागरिकों को यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वीडियो असली है या नकली।
क्या करें नागरिक?
- सोशल मीडिया पर निजी जानकारी और फोटो सीमित साझा करें
- किसी भी धमकी या फिरौती कॉल पर तुरंत पुलिस से संपर्क करें
- अज्ञात क्यूआर कोड पर पैसे ट्रांसफर करने से पहले सत्यापन करें
- साइबर क्राइम पोर्टल पर तुरंत शिकायत दर्ज कराएं






