
इस्लामाबाद: पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक बयान ने सियासी हलकों में बहस छेड़ दी है। उन्होंने अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अतीत में अमेरिका ने अपने हितों के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और बाद में उसे नजरअंदाज कर दिया। उनकी इस टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
विपक्षी दलों और कई विश्लेषकों ने इसे पाकिस्तान की विदेश नीति की विफलता से जोड़कर देखा है, जबकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह बयान दशकों से चले आ रहे सामरिक समीकरणों की ओर संकेत करता है। शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान अमेरिका का प्रमुख सहयोगी रहा। 1950 और 1960 के दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता दी।
पेशावर में अमेरिकी खुफिया गतिविधियों को अनुमति दिए जाने का भी इतिहास रहा है। सोवियत-अफगान युद्ध (1979-1989) के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ मिलकर अफगान मुजाहिदीन का समर्थन किया। बदले में पाकिस्तान को भारी आर्थिक और सैन्य सहायता मिली।
हालांकि, सोवियत वापसी के बाद दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहा। 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान फिर अमेरिका का अहम सहयोगी बना, लेकिन समय-समय पर दोनों देशों के बीच अविश्वास भी सामने आता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य-पूर्व के बीच एक रणनीतिक महत्व देती है।
यही कारण है कि वैश्विक शक्तियां अपने-अपने हितों के अनुसार पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखती हैं। ख्वाजा आसिफ के बयान को कुछ लोग आत्मालोचन मान रहे हैं, तो कुछ इसे घरेलू राजनीति का हिस्सा बता रहे हैं।







