
देहरादून। उत्तराखंड में लंबे समय से तबादलों की प्रतीक्षा कर रहे शिक्षकों को एक बार फिर निराशा हाथ लगी है। राज्य सरकार ने गंभीर बीमारी, दिव्यांगता और विशेष पारिवारिक परिस्थितियों से जुड़े मामलों में तबादलों को मंजूरी देने की अनुमति तो दे दी है, लेकिन अनुरोध आधारित अन्य तबादलों पर फिलहाल निर्णय टाल दिया गया है। इससे दुर्गम और सुगम क्षेत्रों में कार्यरत हजारों शिक्षकों की उम्मीदों पर अस्थायी विराम लग गया है।
शिक्षा विभाग के अनुसार शासन ने ऐसे मामलों में स्थानांतरण समितियों को कार्रवाई की अनुमति प्रदान की है, जिनमें शिक्षक स्वयं, उनके पति या पत्नी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हों, दिव्यांगता की स्थिति हो, बच्चों की गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो या फिर विधवा, विधुर, तलाकशुदा, परित्यक्ता तथा आपदा प्रभावित श्रेणी से संबंधित मामले हों। माता-पिता की गंभीर बीमारी के आधार पर भी तबादले के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है।
जारी आदेश के अनुसार चार प्रधानाचार्यों, 91 प्रवक्ताओं, 97 सहायक अध्यापक एलटी गढ़वाल मंडल तथा 73 सहायक अध्यापक एलटी कुमाऊं मंडल के प्रस्तावों पर स्थानांतरण समितियां नियमानुसार कार्रवाई करेंगी। हालांकि दुर्गम से दुर्गम तथा सुगम से दुर्गम क्षेत्रों में अनुरोध के आधार पर प्रस्तावित तबादलों को फिलहाल रोका गया है। इन मामलों पर अंतिम निर्णय लेने से पहले शासन ने कार्मिक एवं सतर्कता विभाग से परामर्श लेने के लिए प्रस्ताव भेजा है।
शिक्षकों के तबादलों का मुद्दा पिछले कई वर्षों से चर्चा में रहा है। तबादला अधिनियम के तहत प्रत्येक वर्ष निर्धारित समय में स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए, लेकिन विभिन्न प्रशासनिक कारणों से यह प्रक्रिया लगातार प्रभावित होती रही है। पिछले वर्ष भी कई शिक्षकों को तबादलों का लाभ नहीं मिल पाया था और इस वर्ष भी स्थिति लगभग वैसी ही दिखाई दे रही है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानांतरण प्रक्रिया के लिए निर्धारित समयसीमा अब समाप्ति के करीब पहुंच चुकी है। मूल रूप से तबादलों की अंतिम तिथि 10 जून निर्धारित थी, लेकिन प्रक्रिया समय पर पूरी न होने के कारण कार्मिक विभाग ने इसे बढ़ाकर 30 जून कर दिया था। बावजूद इसके शिक्षा विभाग अब तक सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी नहीं कर पाया है।
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में 30 जून तक पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया संपन्न होना मुश्किल है। इसी कारण शासन से अतिरिक्त समय की मांग की गई है। यदि समय सीमा बढ़ाई जाती है तो लंबित मामलों पर आगे कार्रवाई संभव हो सकेगी।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अब तक शिक्षा विभाग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी से आवश्यक अनुमति प्राप्त नहीं की है। वर्तमान में राज्य में निर्वाचक नामावलियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का कार्य चल रहा है। निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुसार इस कार्य से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों का तबादला आयोग की पूर्व अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। ऐसे में तबादला प्रक्रिया पर चुनावी व्यवस्थाओं का भी प्रभाव पड़ रहा है।
शिक्षा सचिव रविनाथ रामन के अनुसार स्थानांतरण समितियों को भेजे गए प्रस्ताव पिछले वर्ष के लंबित मामलों से संबंधित हैं। इन प्रस्तावों के साथ-साथ इस वर्ष के नए आवेदन भी आमंत्रित किए जाएंगे, ताकि सभी पात्र मामलों पर एक साथ विचार किया जा सके। उन्होंने कहा कि विभाग शासन से अतिरिक्त समय प्राप्त करने के प्रयास में है और समय मिलने के बाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
तबादलों में हो रही देरी से विशेष रूप से दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक प्रभावित हैं। अनेक शिक्षक वर्षों से सुगम क्षेत्रों में स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि कुछ शिक्षक पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों में सेवाएं देने को मजबूर हैं। ऐसे में शासन के अगले निर्णय पर हजारों शिक्षकों की निगाहें टिकी हुई हैं।
फिलहाल गंभीर बीमारी और विशेष परिस्थितियों वाले मामलों को प्राथमिकता देते हुए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, जबकि सामान्य अनुरोध आधारित तबादलों पर अंतिम निर्णय कार्मिक एवं सतर्कता विभाग की राय और शासन के अगले आदेश के बाद ही हो सकेगा।




