
देहरादून: उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राज्य सरकार अब बड़ा कदम उठाने जा रही है। शिक्षकों की वर्षों से लंबित पदोन्नति प्रक्रिया को गति देने के लिए सरकार अध्यादेश लाने की तैयारी में है। हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई और शिक्षा विभाग के प्रस्ताव पर सहमति भी बन गई।
प्रदेश में शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के पदों पर भारी कमी चिंता का विषय बन गई है। आंकड़ों के अनुसार, प्रधानाचार्यों के कुल 1385 पदों में से करीब 1250 पद खाली हैं, जो लगभग 90 प्रतिशत है। इसी तरह प्रधानाध्यापकों के 910 में से 870 पद रिक्त हैं। प्रवक्ता स्तर पर भी चार हजार से अधिक पदोन्नति के पद खाली पड़े हैं। प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है।
इन रिक्तियों का सीधा असर स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। कई स्कूल बिना नियमित प्रधानाचार्य के संचालित हो रहे हैं, जिससे प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में सरकार अध्यादेश के जरिए सेवा नियमावली में संशोधन कर पदोन्नति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहती है।
दरअसल, शिक्षकों की पदोन्नति से जुड़े मामले लंबे समय से न्यायालय में लंबित हैं, जिसके कारण प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है। इसे देखते हुए सरकार अध्यादेश के माध्यम से इस गतिरोध को दूर करने का प्रयास कर रही है। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने स्पष्ट किया है कि सरकार छात्र और शिक्षक दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक निर्णय ले रही है।
दूसरी ओर, शिक्षकों में भी इस मुद्दे को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। कई शिक्षक 30 से 32 वर्षों की सेवा पूरी करने के बाद भी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार चाहें तो कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रहते हुए अंतरिम पदोन्नति दे सकती है, जिससे उनकी वर्षों पुरानी मांग पूरी हो सके और शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार आए।
सरकार को उम्मीद है कि अध्यादेश लागू होने के बाद पदोन्नति प्रक्रिया में तेजी आएगी, खाली पद भरे जाएंगे और प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।




