
देहरादून। उत्तराखंड में गन्ना खरीद मूल्य की घोषणा में लगातार देरी को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि गन्ना चूसना तो ठीक है, लेकिन किसानों को चूसना बिल्कुल अच्छा नहीं है, और इस देरी को किसानों की मेहनत का सीधा शोषण बताया। रावत का कहना है कि राज्य के गन्ना किसान पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी सरकार की अनिश्चितता और धीमी प्रक्रियाओं का खामियाज़ा भुगत रहे हैं।
रावत ने कहा कि पूरे प्रदेश में किसान पुराने दरों पर ही गन्ना बेचने को विवश हैं, क्योंकि सरकार आज तक नए खरीद मूल्य की घोषणा नहीं कर सकी है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले वर्ष भी यही स्थिति बनी रही थी, और अंततः किसान बिना किसी बढ़ोतरी के पुराने दरों पर ही गन्ना बेचने को मजबूर रह गए। इस बार भी स्थिति वैसी ही दिख रही है, जबकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश ने पहले ही गन्ने का नया खरीद मूल्य घोषित कर दिया है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड के किसान सरकार की अनदेखी और देरी का लगातार शिकार हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में कृषि आर्थिक मजबूती का आधार है, और गन्ना किसानों को उचित समर्थन दिया जाना चाहिए। रावत ने दावा किया कि गन्ने का वास्तविक और न्यायसंगत मूल्य कम से कम 450 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया जाना चाहिए, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिल सके।
सरकार की इस देरी के विरोध में हरीश रावत ने 27 नवंबर को अपने आवास पर मौन उपवास रखने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि यह उपवास किसानों की आवाज उठाने और सरकार को जगाने का प्रयास है। रावत के इस बयान और उपवास की घोषणा के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है, जबकि किसान संगठन भी सरकार से जल्द मूल्य घोषणा की मांग कर रहे हैं।
प्रदेश में गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों का कहना है कि समय पर मूल्य घोषित न होने से चीनी मिलों में गन्ना भेजने की प्रक्रिया बाधित होती है और उनकी पूरी साल भर की आय प्रभावित होती है। इस मुद्दे ने एक बार फिर राज्य के राजनीतिक और कृषि परिदृश्य में नई बहस छेड़ दी है।





