
देहरादून। राज्य में भालू के हमलों की घटनाओं में लगातार वृद्धि वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख भालुओं के हाइबरनेशन यानी शीत निद्रा में जाने की प्राकृतिक प्रक्रिया का बाधित होना है। सामान्य परिस्थितियों में भालू वर्ष के सबसे ठंडे महीनों में अपने शरीर की ऊर्जा बचाने के लिए शीत निद्रा में चले जाते हैं, मगर हाल के वर्षों में इस पैटर्न में स्पष्ट रूप से बदलाव देखने को मिल रहा है। अब कई भालू तय अवधि तक शीत निद्रा में नहीं रह पा रहे या बिल्कुल भी हाइबरनेशन में नहीं जा रहे हैं।
भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा वर्ष 2011-12 में जम्मू-कश्मीर के दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान और उसके आसपास के क्षेत्रों में किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सात भालुओं को रेडियो कॉलर लगाकर उनके मूवमेंट और व्यवहार का विश्लेषण किया गया था। इस अध्ययन में पाया गया कि भालू औसतन करीब 65 दिन शीत निद्रा में रहते हैं, लेकिन अलग-अलग भालुओं में यह अवधि काफी भिन्न थी। किसी भालू ने 90 दिन तक हाइबरनेशन किया, जबकि एक अन्य भालू मात्र 40 दिन ही शीत निद्रा में रहा। विशेषज्ञ बताते हैं कि सेब और चेरी के बड़े-बड़े बागानों वाले इलाकों में भोजन की उपलब्धता भालुओं को सालभर सक्रिय बनाए रखती है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ती हैं।
सेवानिवृत्त वैज्ञानिक सत्यकुमार बताते हैं कि भालुओं के व्यवहार में यह बदलाव चिंताजनक है। प्राकृतिक परिस्थितियों में बदलाव, तापमान का लगातार बढ़ना, कम बर्फबारी होना और आसानी से मिलने वाला भोजन शीत निद्रा के चक्र को प्रभावित कर रहा है।
उधर, राज्य के वन विभाग ने भी इस दिशा में अध्ययन किया था। वर्ष 2018 में यमकेश्वर ब्लॉक में भालू हमलों के बढ़ने पर एक विशेष अध्ययन किया गया। उस समय लैंसडौन वन प्रभाग में तैनात रहे डीएफओ वैभव कुमार ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि भालू अपेक्षित समय पर हाइबरनेशन में नहीं जा रहे थे और कई तो पूरे वर्ष सक्रिय बने रहे। विभाग के अनुसार मौसम में बदलाव, भोजन संबंधी आदतों में परिवर्तन और मानव बस्तियों के नजदीक भोजन की उपलब्धता इस असामान्य व्यवहार के पीछे मुख्य कारण हो सकते हैं।
लगातार बढ़ती इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भालुओं का पारंपरिक जीवन चक्र तेजी से बदल रहा है, और इसके परिणामस्वरूप इंसानों के साथ उनके संघर्ष भी बढ़ते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते वन्यजीव प्रबंधन, भोजन उपलब्धता और जंगलों के प्राकृतिक संतुलन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।




