
देहरादून। अभिनेत्री सारा अली खान की केदारनाथ यात्रा को लेकर उठ रहे सवालों और फतवा जारी किए जाने की चर्चाओं के बीच पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कट्टरपंथी सोच पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि धर्मपरायण होना और कट्टर होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति की आस्था पर सवाल उठाना या उसे किसी धार्मिक स्थल पर जाने से रोकना उचित नहीं है।
हरीश रावत ने इंटरनेट मीडिया पर की गई पोस्ट में सारा अली खान की केदारनाथ यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि अभिनेत्री पिछली बार भी श्रद्धापूर्वक केदारनाथ पहुंची थीं और इस बार भी उन्होंने वहां दर्शन किए। उन्होंने कहा कि सारा अली खान की अपनी आस्था है। वह नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर की पोती तथा अभिनेता सैफ अली खान की बेटी हैं। वह अपने परिवार से मिले धार्मिक संस्कारों का भी पालन करती हैं।
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रावत ने कहा कि इस्लाम में मूर्ति पूजा नहीं होती, लेकिन आस्था और मूर्ति पूजा के बीच अंतर समझना जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल पर जाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करता है या वहां ध्यान लगाता है, तो उसे रोकने का अधिकार किसी को नहीं है। उन्होंने कहा कि संभव है कि कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल पर जाकर अल्लाह का स्मरण भी कर रहा हो। दुनिया की सारी भूमि नारायण, अल्लाह, गॉड और भगवान की है।
हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में कट्टरपंथी तत्व
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पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कट्टरपंथिता से समाज और देश पहले ही काफी प्रभावित हैं। ऐसे तत्व किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में मौजूद हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग केवल चर्चा में बने रहने के लिए समाज में कटुता फैलाने का प्रयास करते हैं।
हरीश रावत ने कहा कि ऐसे लोग न हिंदुओं के हितैषी हैं और न मुसलमानों के। वे अपने धर्म का भी भला नहीं कर रहे हैं। धर्म का पालन करना और उसके गुणों का प्रचार करना अलग बात है, जबकि दूसरे व्यक्ति की आस्था को रोकना कट्टरता है।





