
नई दिल्ली। चुनावी मतदाता सूचियों की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमति ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और आयोग की कार्यप्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान आयोग के कई निर्णयों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, SIR से संबंधित अपीलों तथा चुनावी मतदाता डेटा के प्रबंधन से था। कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि महत्वपूर्ण निर्णय उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दोनों आयुक्तों ने चुनावी डेटा के IT सिस्टम और उसके केंद्रीकरण से जुड़े मुद्दों को लेकर भी चिंता जताई।
SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी और इसके बाद इसे अन्य राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
Form-6 में बदलाव पर भी आपत्ति
रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया था। इस बदलाव पर विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने आपत्ति जताई थी। संधू ने 13 अगस्त को दर्ज टिप्पणी में इस बदलाव को “unauthorised and illegal” बताते हुए इसे हटाने की मांग की थी।
पश्चिम बंगाल में अपीलों का मामला
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची में हुए बदलाव को लेकर भी मामला चर्चा में है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि करीब 38.31 लाख अपीलें दाखिल की गई हैं। इनमें 22.21 लाख अपीलें उन मतदाताओं की हैं जिनके नाम हटाए गए थे और उन्होंने नाम बहाल करने की मांग की, जबकि 16.10 लाख अपीलें ऐसे मतदाताओं के खिलाफ दाखिल हुईं जिन्हें सूची में शामिल किया गया था।
इसी प्रक्रिया को लेकर संधू ने सवाल उठाया था कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा मतदाता सूची में शामिल किए गए लोगों के खिलाफ अपील दाखिल करने का अधिकार किसे दिया गया और इसकी प्रक्रिया क्या थी। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें, विवेक जोशी और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इस प्रक्रिया के आधार की जानकारी नहीं दी गई थी।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग की ओर से इन मतभेदों की व्याख्या अलग तरीके से की गई। आयोग से जुड़े सूत्रों ने कहा कि SIR सहित सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और निर्णय सर्वसम्मत थे। यह स्पष्टीकरण उन मीडिया रिपोर्टों के बाद आया जिनमें दो आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया था।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट पहले से ही SIR और मतदाता सूचियों में बदलाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। पश्चिम बंगाल में लंबित अपीलों और दिल्ली में SIR नोटिस से जुड़े मामलों में भी पारदर्शिता तथा मतदाताओं को पर्याप्त जानकारी देने के मुद्दे अदालत के सामने उठे हैं।
इसलिए वर्तमान विवाद का केंद्र केवल आयोग के भीतर मतभेद नहीं, बल्कि यह व्यापक सवाल भी है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए, निर्णय लेने की जिम्मेदारी किस स्तर पर हो और मतदाताओं को अपने नाम से जुड़े फैसलों के खिलाफ प्रभावी अपील का कितना अवसर मिले।




