
नैनीताल | नैनीताल शहर के मध्य स्थित ऐतिहासिक रैमजे (जीबी पंत) अस्पताल की जर्जर और उपेक्षित स्थिति एक बार फिर चर्चा में आ गई है। करीब 27 एकड़ क्षेत्रफल में फैला यह अस्पताल परिसर, जो कभी पूरे कुमाऊं मंडल के प्रमुख चिकित्सा केंद्रों में गिना जाता था, आज वीरानी और प्रशासनिक उपेक्षा का प्रतीक बन चुका है। अस्पताल के अधिकांश वार्ड, ऑपरेशन थिएटर, कार्यालय और अन्य चिकित्सा इकाइयां बंद पड़ी हैं तथा उनके दरवाजों पर ताले लटके हुए हैं।
शुक्रवार को क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट ने अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अस्पताल परिसर की स्थिति देखकर वे स्वयं आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें अस्पताल में न तो पर्याप्त चिकित्सा कर्मचारी मिले और न ही किसी प्रकार की सक्रिय स्वास्थ्य सेवा दिखाई दी। परिसर में मौजूद एक नर्स ने सांसद को बताया कि अस्पताल में फिलहाल मरीजों के उपचार की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। चिकित्सकों और कर्मचारियों की भारी कमी के कारण अस्पताल लगभग निष्क्रिय हो चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि परिसर का उपयोग कभी-कभी फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग के लिए किया जाता है।
निरीक्षण के दौरान यह सामने आया कि अस्पताल में वर्षों पुराने बिस्तर सड़ चुके हैं, खिड़कियां और दरवाजे जर्जर हो गए हैं तथा लकड़ी का फर्श भी गलने लगा है। भवन के कई हिस्सों में रखरखाव के अभाव के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं। अस्पताल में स्टाफ के नाम पर केवल कुछ नर्सिंग कर्मी, दो फार्मासिस्ट और एक चिकित्सक की नियुक्ति है, जबकि एकमात्र चिकित्सक उच्च शिक्षा के लिए लंबे अवकाश पर हैं। इससे मरीजों को यहां किसी प्रकार की नियमित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सांसद अजय भट्ट ने मौके से ही स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल से दूरभाष पर बातचीत की। उन्होंने अस्पताल की दयनीय हालत से अवगत कराते हुए इसके पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता बताई। सांसद ने अस्पताल की वर्तमान स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करने हेतु एक समिति गठित करने का सुझाव दिया तथा स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को अस्पताल के पुनर्जीवन के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश देने का अनुरोध किया। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि अस्पताल के विकास और जीर्णोद्धार के लिए केंद्र सरकार स्तर पर भी आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा।
ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1893 में स्थापित रैमजे अस्पताल कभी कुमाऊं क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माना जाता था। बाद में इसका नाम जीबी पंत अस्पताल रखा गया। दशकों तक यह अस्पताल अपनी उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं, अनुभवी चिकित्सकों और कुशल सर्जनों के कारण प्रसिद्ध रहा। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों से भी मरीज यहां उपचार के लिए पहुंचते थे। अस्पताल की ख्याति इतनी व्यापक थी कि कई लोग विशेष रूप से यहां के प्रसिद्ध चिकित्सकों से इलाज कराने आते थे।
हालांकि समय के साथ संसाधनों की कमी, पर्याप्त चिकित्सकों की नियुक्ति न होना और प्रशासनिक उदासीनता के कारण अस्पताल की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। आज यह अस्पताल अपने गौरवशाली अतीत की यादों तक सीमित होकर रह गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो यह ऐतिहासिक धरोहर पूरी तरह निष्प्रभावी हो जाएगी।
फिलहाल अस्पताल परिसर में केवल डायलिसिस सेवा संचालित हो रही है, जिसका संचालन हंस फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है। संस्था द्वारा उपकरण, चिकित्सक और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे क्षेत्र के कुछ मरीजों को राहत मिल रही है।
स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने अस्पताल को पुनः सक्रिय करने, विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति करने और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग उठाई है। लोगों का मानना है कि यदि सरकार गंभीरता से पहल करे तो रैमजे अस्पताल एक बार फिर नैनीताल और पूरे कुमाऊं क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।





