
देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने राज्य में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की मान्यता और नवीनीकरण प्रक्रिया को नई व्यवस्था के तहत संचालित करने के लिए विस्तृत नियमावली जारी कर दी है। एक जुलाई 2026 से लागू होने वाली इस व्यवस्था के तहत मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उसकी जगह उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण कार्यभार संभालेगा। हालांकि नई नियमावली में शामिल कुछ प्रावधानों ने शिक्षा क्षेत्र में बहस और सवालों को जन्म दे दिया है।
सरकार की ओर से जारी नियमावली के अनुसार, किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता के नवीनीकरण के लिए यह प्रमाणित करना होगा कि पिछले तीन शैक्षणिक वर्षों के दौरान प्रत्येक वर्ष में गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों की संख्या कुल नामांकन का 15 प्रतिशत से अधिक नहीं रही है। संस्थानों को इसके लिए स्वयं घोषणा पत्र भी देना होगा।
विशेषज्ञों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि यह शर्त मदरसों के लिए तो अपेक्षाकृत सहज हो सकती है, लेकिन सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय द्वारा संचालित अनेक शिक्षण संस्थानों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है। इन संस्थानों में लंबे समय से विभिन्न समुदायों के छात्र शिक्षा प्राप्त करते रहे हैं और कई जगह अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों की संख्या 85 प्रतिशत से काफी कम है।
नई व्यवस्था के तहत राज्य सरकार ने मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय लिया है। इसके स्थान पर गठित उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण अब मदरसों सहित सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता प्रदान करेगा, उनका नवीनीकरण करेगा तथा नियामक प्रक्रियाओं की निगरानी करेगा।
नियमावली में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मान्यता प्राप्त करने या उसका नवीनीकरण कराने के इच्छुक संस्थानों को प्राधिकरण के आधिकारिक वेब पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। आवेदन के साथ निर्धारित शुल्क भी डिजिटल माध्यम से जमा करना अनिवार्य रहेगा। इससे पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने का प्रयास किया गया है।
शिक्षा जगत में चर्चा इस बात को लेकर भी है कि यदि 15 प्रतिशत गैर-अल्पसंख्यक छात्रों की सीमा को सख्ती से लागू किया गया तो कई पुराने और प्रतिष्ठित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को अपनी प्रवेश नीति में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। इससे संस्थानों की छात्र संरचना और संचालन व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना है।
सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की वास्तविक पहचान और उद्देश्य को संरक्षित करना है, जबकि दूसरी ओर कई शिक्षाविदों का मानना है कि नियमों के व्यावहारिक पहलुओं पर और अधिक स्पष्टता आवश्यक है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई नियमावली को लागू करने के दौरान सरकार और प्राधिकरण इन चिंताओं का समाधान किस प्रकार करते हैं।
एक जुलाई 2026 से नई व्यवस्था लागू होने के बाद उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा क्षेत्र के नियमन और मान्यता प्रक्रिया में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। फिलहाल सबसे अधिक चर्चा गैर-अल्पसंख्यक छात्रों की 15 प्रतिशत सीमा वाली शर्त को लेकर हो रही है, जिसके प्रभाव का आकलन आने वाले महीनों में स्पष्ट हो सकेगा।





