
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में इस वर्ष कम बर्फबारी का असर अब वन्यजीव व्यवहार पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। शीत निद्रा (हाइबरनेशन) में जाने के बजाय भालू सक्रिय बने हुए हैं और भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में भय का माहौल है, वहीं वन विभाग की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 से अब तक राज्य में भालू के हमलों की नौ घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। पिछले वर्ष 2025 में भालू हमलों की कुल 116 घटनाएं हुई थीं, जिनमें आठ लोगों की मृत्यु और 108 लोग घायल हुए थे। इस वर्ष की शुरुआत में ही बढ़ती घटनाओं ने संकेत दे दिया है कि स्थिति गंभीर हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भालू के शीत निद्रा में जाने के लिए पर्याप्त और लगातार बर्फबारी आवश्यक होती है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सत्य कुमार के अनुसार, लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर कम से कम तीन माह तक एक फीट या उससे अधिक बर्फ जमी रहनी चाहिए। इस वर्ष अक्तूबर के बाद से न तो पर्याप्त वर्षा हुई और न ही नियमित बर्फबारी, जिसके कारण प्राकृतिक चक्र प्रभावित हुआ है।
वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक पंकज चौहान का भी मानना है कि पिछले एक दशक में हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी का पैटर्न बदल गया है। दिसंबर-जनवरी के बीच नियमित अंतराल पर पांच से छह बार बर्फबारी होना जरूरी है, लेकिन अब बर्फ अधिकतर प्री-समर अवधि में गिरती है, जो जल्दी पिघल जाती है। इससे ग्लेशियरों के साथ-साथ वन्यजीवों के व्यवहार पर भी प्रभाव पड़ रहा है।
वन संरक्षक (गढ़वाल वृत्त) आकाश वर्मा ने बताया कि जिन क्षेत्रों में भालुओं की सक्रियता अधिक देखी जा रही है, वहां निगरानी बढ़ा दी गई है। ग्रामीणों को सतर्क रहने और अकेले जंगल की ओर न जाने की सलाह दी गई है।
विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन से भी जोड़ रहे हैं। मौसम चक्र में हो रहे बदलाव से न केवल मानव जीवन बल्कि वन्यजीवों की प्राकृतिक दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बर्फबारी नहीं हुई, तो भालू और अन्य वन्यजीवों की आबादी की ओर आवाजाही बढ़ सकती है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में और इजाफा होने की आशंका है।
ऐसे में जरूरत है कि संवेदनशील क्षेत्रों में सामुदायिक जागरूकता बढ़ाई जाए, वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया टीम सक्रिय रहे और दीर्घकालिक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से समझते हुए नीतिगत कदम उठाए जाएं।




