
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर तीखे बयान, आरोप-प्रत्यारोप और सियासी तंज सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन इस बार राजनीति में चावल की खुशबू और आत्मीयता घुली नजर आई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने सियासी कटाक्षों से आगे बढ़कर परंपरा, सम्मान और सौहार्द का संदेश दिया।
हल चलाने से चावल भेंट करने तक का सफर
कुछ माह पूर्व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं खेत में उतरकर हल चलाया था और धान की रोपाई की थी। यह कदम जहां एक ओर किसानों के प्रति सम्मान और कृषि से जुड़ाव का प्रतीक माना गया, वहीं उस समय पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस पर सियासी तंज भी कसा था। यह तंज खूब चर्चा में रहा और राजनीतिक गलियारों में बहस का विषय बना। समय बीता, फसल तैयार हुई और उसी खेत में उगे धान से बने चावल अब राजनीति का एक नया अध्याय बन गए।
हरीश रावत के घर पहुँचे सीएम धामी
शुक्रवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी देहरादून के डिफेंस कॉलोनी स्थित पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के आवास पहुंचे। उन्होंने न सिर्फ उनसे आत्मीय मुलाकात कर उनका हालचाल जाना, बल्कि अपने खेत में उत्पादित धान के चावल उन्हें भेंट किए। यह भेंट केवल एक उपहार नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश, परंपरा और संस्कार का प्रतीक बन गई।
तंज का जवाब, मगर शालीनता के साथ
जहां पहले खेत में हल चलाने पर सियासी कटाक्ष हुआ था, वहीं अब उसी खेत की अच्छी फसल से निकले चावल लेकर पूर्व मुख्यमंत्री के घर पहुंचना अपने आप में एक शालीन और प्रतीकात्मक जवाब माना जा रहा है। इस मुलाकात ने यह संकेत दिया कि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत सम्मान और सांस्कृतिक मूल्यों की जगह हमेशा बनी रहती है।
मुख्यमंत्री का संदेश
मुख्यमंत्री धामी ने इस अवसर पर कहा कि यह भेंट उत्तराखंड की कृषि परंपरा, किसानों की मेहनत और स्थानीय उत्पादों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रदेश की पहचान खेती, किसानी और ग्रामीण संस्कृति से जुड़ी हुई है, जिसे सियासत से ऊपर रखा जाना चाहिए।
सियासी गलियारों में चर्चा
इस मुलाकात और चावल भेंट करने की घटना ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। कुछ लोग इसे सियासी सौहार्द का उदाहरण मान रहे हैं, तो कुछ इसे आगामी राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, आम जनता के लिए यह दृश्य राजनीति में एक सकारात्मक और मानवीय पहल के रूप में सामने आया है। कुल मिलाकर, उत्तराखंड की राजनीति में यह घटना यह संदेश देती है कि हल से शुरू हुई मेहनत जब फसल बनती है, तो वह केवल अनाज नहीं, बल्कि संवाद और सौहार्द का माध्यम भी बन सकती है।




