
देहरादून। उत्तराखंड में सर्दियों की आहट के साथ ही भालुओं की आबादी वाले क्षेत्रों में आवाजाही बढ़ने लगी है। जंगलों से निकलकर गांवों और रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहे भालुओं के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ गया है। चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी समेत प्रदेश के कई क्षेत्रों में भालुओं की मौजूदगी से लोग दहशत में हैं। कहीं ग्रामीण जंगलों में जाने से कतरा रहे हैं, तो कहीं अभिभावक बच्चों को खुद स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर हैं। स्थिति को देखते हुए वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और गश्त बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
विशेषज्ञों के मुताबिक, अक्टूबर का महीना भालुओं की गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण होता है। हाइबरनेशन यानी शीतनिद्रा की अवधि से पहले भालू अपने शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ाते हैं। इस दौरान उन्हें अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। जंगल में पर्याप्त भोजन की तलाश के साथ-साथ वे आबादी वाले क्षेत्रों में भी पहुंच जाते हैं, जहां उन्हें खाने-पीने की चीजें आसानी से मिल सकती हैं।
हाइबरनेशन से पहले शरीर में जमा करते हैं चर्बी
भारतीय वन्यजीव संस्थान के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक सत्य कुमार के अनुसार, हाइबरनेशन से पहले भालू अपने शरीर में चर्बी बढ़ाते हैं। यही चर्बी शीतनिद्रा के दौरान उनके शरीर को ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करती है। अधिक भोजन की तलाश में भालू जंगलों से निकलकर उन स्थानों तक पहुंच सकते हैं, जहां उन्हें आसानी से खाने की चीजें मिलती हैं।
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
विशेषज्ञों का कहना है कि इस अवधि में लोगों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों, खेतों में काम करने वाले लोगों और सुबह-शाम घर से बाहर निकलने वालों को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
सितंबर से नवंबर तक बढ़ता है भालुओं का मूवमेंट
अपर प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव विवेक पांडे के अनुसार, सितंबर से नवंबर और फरवरी के दौरान भालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। भोजन की तलाश में आबादी की ओर उनका रुख होने से इंसानों के साथ आमना-सामना होने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसी परिस्थितियों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं सामने आ सकती हैं।
वन विभाग ने अधिकारियों को संवेदनशील स्थानों पर नियमित गश्त करने, कैमरा ट्रैप लगाने और स्थानीय लोगों को जागरूक करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही आबादी के आसपास जमा कूड़े के ढेरों की सफाई कराने पर भी जोर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, खाने की गंध और आसानी से उपलब्ध भोजन भालुओं को रिहायशी क्षेत्रों की ओर आकर्षित कर सकते हैं। इसके लिए जिला प्रशासन के सहयोग से सफाई और अन्य सुरक्षात्मक उपाय किए जाएंगे।
जनवरी से सितंबर तक चार लोगों की मौत, 40 घायल
प्रदेश में भालुओं के हमलों की घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जनवरी से सितंबर तक भालुओं के हमलों में चार लोगों की जान गई, जबकि 40 लोग घायल हुए। भालुओं ने कुछ स्थानों पर भवनों को भी नुकसान पहुंचाया है।
लगातार सामने आ रही घटनाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भय का माहौल है। लोगों को आशंका है कि भोजन की तलाश में गांवों के आसपास घूम रहे भालुओं से किसी भी समय सामना हो सकता है। ऐसे में वन विभाग की निगरानी के साथ-साथ ग्रामीणों की सतर्कता भी महत्वपूर्ण हो गई है।
उत्तरकाशी के ज्ञाणजा गांव में भालू की आवाजाही से लोग परेशान
उत्तरकाशी जिले के ज्ञाणजा गांव में भालू की लगातार आवाजाही बनी हुई है। इसके चलते ग्रामीण जंगल में जाने से कतरा रहे हैं। जंगलों पर निर्भर ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा के काम करना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। लोगों को आशंका है कि जंगल के रास्तों या आसपास के क्षेत्रों में भालू से सामना हो सकता है।
चमोली के नेल सिदेली गांव में बच्चों की सुरक्षा की चिंता
चमोली जिले के नेल सिदेली गांव में भालू की दहशत के चलते अभिभावक बच्चों को खुद स्कूल छोड़ने जा रहे हैं। भालू की मौजूदगी ने बच्चों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि वन विभाग की गश्त और निगरानी बढ़ने से स्थिति में सुधार होगा।
टिहरी के टोला गांव में चार मकानों को नुकसान
टिहरी जिले के टोला गांव में भी भालू की दहशत बनी हुई है। जानकारी के अनुसार, भालू ने गांव में चार मकानों को क्षतिग्रस्त कर दिया। इस घटना के बाद ग्रामीणों में भय का माहौल है और लोग अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।
आबादी के आसपास सफाई और सतर्कता जरूरी
वन विभाग के सामने भालुओं की आवाजाही पर निगरानी रखने के साथ ही उन्हें आबादी की ओर आकर्षित करने वाले कारणों को कम करने की चुनौती है। इसके लिए संवेदनशील इलाकों में गश्त, कैमरा ट्रैप और जागरूकता अभियान के साथ कूड़े के ढेरों की सफाई भी जरूरी मानी जा रही है।
ग्रामीणों को सलाह दी जाती है कि भालू दिखाई देने पर उसके पास जाने, उसे घेरने या छेड़ने की कोशिश न करें। बच्चों को अकेले संवेदनशील रास्तों पर न भेजें और भालू की मौजूदगी की सूचना तत्काल वन विभाग को दें। भालू के सामने आने पर सुरक्षित दूरी बनाए रखना और स्थानीय वन अधिकारियों के निर्देशों का पालन करना जरूरी है।
सर्दियों से पहले भालुओं की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए वन विभाग के लिए चुनौती यह है कि वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को भी रोका जाए। इसके लिए विभागीय निगरानी, स्थानीय प्रशासन का सहयोग और ग्रामीणों की सतर्कता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।





