
देहरादून। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता को लेकर नई तस्वीर सामने आई है। प्रदेश में मदरसों को छोड़कर 91 अन्य अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान हैं, लेकिन इनमें से अब तक केवल दो ही राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता लेने के लिए आगे आए हैं। नियमों के तहत मान्यता और नवीनीकरण के लिए संस्थानों में कम से कम 85 प्रतिशत छात्र अल्पसंख्यक समुदाय के होने चाहिए। इसके बावजूद अधिकांश संस्थानों की ओर से मान्यता नहीं लिए जाने से उनके पात्रता मानकों और अल्पसंख्यक दर्जे के आधार पर मिल रही सुविधाओं पर सवाल उठ रहे हैं।
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सरकार ने मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता के लिए करीब आठ माह पहले राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया था। इसके बाद निर्धारित मानकों के अनुसार संस्थानों को प्राधिकरण से मान्यता लेने की प्रक्रिया पूरी करनी थी। हालांकि, मदरसों को छोड़कर अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की ओर से अपेक्षित पहल नहीं दिखाई दी है।
प्रदेश में 452 मदरसे और 91 अन्य अल्पसंख्यक संस्थान
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 452 मदरसे और 91 अन्य अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान हैं। इन 91 संस्थानों में 27 माध्यमिक स्तर के और 64 बेसिक स्तर के संस्थान शामिल हैं।
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अब तक 35 मदरसों और केवल दो अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों ने प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त की है। इस तरह गैर-मदरसा अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में मान्यता लेने वालों की संख्या बेहद कम है।
सरकार की ओर से मान्यता की प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद भी अधिकांश संस्थानों का आगे नहीं आना चर्चा का विषय बना हुआ है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले संस्थानों की वास्तविक संख्या कितनी है और अब तक अल्पसंख्यक दर्जे के आधार पर सुविधाएं प्राप्त कर रहे संस्थानों की पात्रता किस आधार पर निर्धारित की जा रही है।
मान्यता के लिए 85 प्रतिशत अल्पसंख्यक छात्र जरूरी
उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता संबंधी नियमावली में विद्यार्थियों की संख्या को लेकर स्पष्ट शर्त निर्धारित की गई है। इसके अनुसार, किसी संस्थान में कम से कम 85 प्रतिशत छात्र अल्पसंख्यक समुदाय के होने चाहिए। दूसरे शब्दों में, गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों की संख्या 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
मान्यता के नवीनीकरण के लिए संस्थानों को पिछले तीन वर्षों के प्रवेश रजिस्टर की प्रति उपलब्ध करानी होगी। इसके साथ ही संस्थान को स्वघोषणा पत्र देना होगा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के 15 प्रतिशत से अधिक छात्र नामांकित नहीं थे।
नियमों के अनुसार, संस्थानों को प्रत्येक तीन वर्ष में मान्यता का नवीनीकरण भी कराना होगा। इसका उद्देश्य निर्धारित मानकों के पालन को सुनिश्चित करना है।
पात्रता और सुविधाओं को लेकर उठ रहे सवाल
प्राधिकरण से मान्यता लेने के लिए संस्थानों के आगे नहीं आने के कारण उनके अल्पसंख्यक दर्जे और इससे मिलने वाली सुविधाओं की पात्रता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, जिन संस्थानों में निर्धारित 85 प्रतिशत अल्पसंख्यक छात्र नहीं हैं, उनके दर्जे और उससे मिलने वाली छूट की वैधता की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मान्यता नहीं लेने वाले सभी संस्थान निर्धारित छात्र संख्या की शर्त पूरी नहीं करते। लेकिन मान्यता की प्रक्रिया में कम भागीदारी के कारण संस्थानों की पात्रता और नियमों के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी माना जा रहा है।
नियमों के तहत संस्थानों को अपनी छात्र संख्या और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के आधार पर मान्यता प्राप्त करनी होगी। इसके बाद ही निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उनकी पात्रता का आकलन किया जा सकेगा।
प्राधिकरण अध्यक्ष ने जल्द मान्यता लेने की अपील की
राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी ने कहा कि मान्यता के लिए संस्थान में 85 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र होने चाहिए। उन्होंने संस्थानों से सभी मानकों को पूरा करते हुए जल्द से जल्द मान्यता लेने की अपील की है।
प्राधिकरण की ओर से निर्धारित शर्तों के पालन और मान्यता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शेष अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान कब तक मान्यता के लिए आवेदन करते हैं और निर्धारित मानकों के अनुरूप अपनी पात्रता प्रमाणित करते हैं।
प्रदेश में मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता की यह प्रक्रिया शिक्षा व्यवस्था में नियमों के अनुपालन और संस्थानों की पात्रता स्पष्ट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।





