
देहरादून: उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में वर्षों से लंबित पदोन्नतियों का संकट एक बार फिर गहरा गया है। प्रदेश के राजकीय हाईस्कूलों में कार्यरत प्रधानाध्यापकों का पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी स्थायीकरण नहीं हो सका है। इसके चलते उनकी अगली पदोन्नति की प्रक्रिया भी प्रभावित हो गई है। शिक्षा निदेशालय ने सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों (सीईओ) से संबंधित प्रधानाध्यापकों के स्थायीकरण के प्रस्ताव मांगे हैं, जिसके बाद पदोन्नति प्रक्रिया एक बार फिर धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
शिक्षा विभाग में वर्ष 2018 के बाद से शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों की पदोन्नतियां नियमित रूप से नहीं हो पाई हैं। इसका सीधा असर हजारों शिक्षकों के सेवा जीवन पर पड़ा है। बड़ी संख्या में शिक्षक 30 से 35 वर्ष की लंबी सेवा देने के बाद भी एक ही पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे शिक्षकों को उम्मीद थी कि विभाग अब लंबित प्रक्रियाओं को पूरा करेगा, लेकिन स्थायीकरण की नई प्रक्रिया ने उनकी उम्मीदों पर फिर विराम लगा दिया है।
राजकीय शिक्षक संघ के पूर्व प्रांतीय महामंत्री रमेश पैन्यूली का कहना है कि विभाग में कार्यरत अधिकांश प्रधानाध्यापकों ने लगभग 35 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है। ऐसे में पदोन्नति से पहले दोबारा स्थायीकरण की प्रक्रिया अपनाने का कोई औचित्य नहीं बनता। उनका कहना है कि इन शिक्षकों का प्रवक्ता पद पर रहते हुए पहले ही स्थायीकरण किया जा चुका था। यदि विभाग को प्रधानाध्यापक बनने के बाद भी स्थायीकरण करना आवश्यक था, तो परिवीक्षा अवधि (प्रोबेशन) समाप्त होते ही यह प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए थी। वर्षों बाद इसे आधार बनाकर पदोन्नति रोकना शिक्षकों के हित में नहीं है।
शिक्षक संगठनों के अनुसार वर्ष 2021 में लगभग 350 शिक्षक पदोन्नति पाकर प्रधानाध्यापक बने थे। इनमें से कई अधिकारी अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं, जबकि शेष अधिकारी अभी भी अगली पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। समय पर पदोन्नति नहीं मिलने से न केवल उनका कैरियर प्रभावित हुआ है, बल्कि विभाग में वरिष्ठ पदों पर रिक्तियां भी लगातार बढ़ती जा रही हैं।
स्थिति यह है कि शिक्षा विभाग में प्रधानाध्यापकों के लगभग 93 प्रतिशत और प्रधानाचार्यों के करीब 90 प्रतिशत पद रिक्त बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद पदोन्नति प्रक्रिया पूरी गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है। इससे विद्यालयों के प्रशासनिक संचालन और शैक्षणिक व्यवस्था पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
इधर, सहायक अध्यापक एलटी से प्रवक्ता पद पर पदोन्नति का मामला भी वर्षों से लंबित है। विभाग में लगभग 3500 पदों पर पदोन्नति नहीं हो सकी है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि वर्ष 2018 से लंबित पदोन्नतियों के कारण अनेक शिक्षक बिना किसी पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समयबद्ध तरीके से पदोन्नति और स्थायीकरण की प्रक्रिया पूरी की जाए तो विभाग में रिक्त पद भरने के साथ-साथ शिक्षकों का मनोबल भी बढ़ेगा।
शिक्षक संगठनों ने शिक्षा विभाग से मांग की है कि स्थायीकरण की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करते हुए वर्षों से लंबित पदोन्नतियों को प्राथमिकता के आधार पर निस्तारित किया जाए, ताकि रिक्त पदों पर नियुक्तियां हो सकें और विद्यालयों में प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत बन सके।




