
अमेरिका के पूर्व और पुनः निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। बर्फ से ढका, कम आबादी वाला लेकिन खनिज संसाधनों से भरपूर यह आर्कटिक क्षेत्र लंबे समय से वैश्विक शक्तियों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। ट्रंप की दिलचस्पी ग्रीनलैंड में कोई नई नहीं है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने इसे खरीदने का प्रस्ताव रखा था, जिसे डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था। उस फैसले से नाराज होकर ट्रंप ने 2019 में डेनमार्क की अपनी प्रस्तावित राजकीय यात्रा तक रद्द कर दी थी।
2025 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप ने एक बार फिर इस मुद्दे को हवा दी है। उन्होंने ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियां अमेरिका के लिए खतरा बन सकती हैं। इसी क्रम में अमेरिकी प्रशासन ने ग्रीनलैंड से संबंध मजबूत करने के लिए एक विशेष दूत (स्पेशल एनवॉय) की नियुक्ति भी की।
हाल ही में ट्रंप ने यह दावा कर विवाद और बढ़ा दिया कि अमेरिका ग्रीनलैंड को “किसी न किसी तरह” हासिल करेगा। इस बयान ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों में राजनीतिक और कूटनीतिक अलार्म बजा दिया। डेनमार्क के यूरोपीय संसद सदस्य एंडर्स विस्टीसन ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। यूरोपीय संसद में उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड पिछले 800 वर्षों से डेनिश किंगडम का हिस्सा है और यह कोई ऐसी संपत्ति नहीं है जिसे खरीदा या बेचा जा सके।
विस्टीसन का बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसे डेनमार्क की सामूहिक राजनीतिक भावना का प्रतीक माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
इस बीच, ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेम्स फ्रेडरिक नीलसन और डेनमार्क की प्रधानमंत्री मैटे फ्रेडरिकसन ने भी एक सुर में कहा कि ग्रीनलैंड पूरी तरह से गैर-बिकाऊ है। दोनों नेताओं ने दोहराया कि ग्रीनलैंड नाटो का हिस्सा है और उसकी सुरक्षा बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय ढांचे के अंतर्गत ही सुनिश्चित की जाएगी।
कोपेनहेगन में हुई एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नीलसन ने कहा कि वर्तमान समय वैश्विक भू-राजनीतिक संकट का दौर है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि कभी किसी एक पक्ष को चुनने की नौबत आई, तो ग्रीनलैंड डेनमार्क, नाटो और यूरोपीय संघ के साथ खड़ा रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संतुलन का एक अहम केंद्र बनने जा रहा है। अमेरिका, रूस, चीन और यूरोप—सभी की नजरें आर्कटिक पर टिकी हैं, लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने यह संदेश दे दिया है कि संप्रभुता और आत्मनिर्णय के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा।





